वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 450, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ें( ३२८ )
कृष्ण भगवान् गीताके तीसरे अध्यायके छठे श्लोकमें कहते हैं :—
कर्मैन्द्रियाणि संयम्य य ब्राह्मते मनसा स्मरन् ।
इन्द्रियार्थान् विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥
जो मनुष्य कर्मैन्द्रियोंको वशमें करके कुछ काम तो नहीं करता ; किन्तु मनमें इन्द्रियोंके विषयोंका ध्यान किया करता है, वह मनुष्य मूढ़ा और पाखण्डी है ।
मतलब यह है, कि मनुष्यको हाथ, पाँव, मुँह, गुदा और लिङ्गको वशमें कर लेने और इनसे कोई काम न लेनेसे कोई लाभ नहीं ; इनसे तो इनका काम लेना ही चाहिये ; किन्तु आँख, कान, नाक, जीभ और त्वचाको वशमें करना चाहिये । आँख कान आदि पाँचों ज्ञान-इन्द्रियोंको वशमें करना या अपने-अपने विषयोंसे रोकना ज़रूरी है । बहुतसे लोग, जाहिरमें सिद्ध बननेके लिये, हाथ पाँव प्रभृति कर्मैन्द्रियोंसे काम नहीं लेते, किन्तु मनमें भाँति-भाँतिके इन्द्रिय-विषयोंको इच्छा किया करते हैं । भगवान् कृष्ण ऐसोंको पाखण्डी कहते हैं ।
सबसे अच्छा और सिद्ध पुरुष वही है, जो जाहिरा तो काम करता है, किन्तु अन्दरसे मन और ज्ञानैन्द्रियोंको विषय-वासनासे रोकता है । गीतामें कहा है :—
यत्स्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन ।
कर्मैन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥७॥