भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ३२८ )

कृष्ण भगवान् गीताके तीसरे अध्यायके छठे श्लोकमें कहते हैं :—

कर्मैन्द्रियाणि संयम्य य ब्राह्मते मनसा स्मरन् ।

इन्द्रियार्थान् विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥

जो मनुष्य कर्मैन्द्रियोंको वशमें करके कुछ काम तो नहीं करता ; किन्तु मनमें इन्द्रियोंके विषयोंका ध्यान किया करता है, वह मनुष्य मूढ़ा और पाखण्डी है ।

मतलब यह है, कि मनुष्यको हाथ, पाँव, मुँह, गुदा और लिङ्गको वशमें कर लेने और इनसे कोई काम न लेनेसे कोई लाभ नहीं ; इनसे तो इनका काम लेना ही चाहिये ; किन्तु आँख, कान, नाक, जीभ और त्वचाको वशमें करना चाहिये । आँख कान आदि पाँचों ज्ञान-इन्द्रियोंको वशमें करना या अपने-अपने विषयोंसे रोकना ज़रूरी है । बहुतसे लोग, जाहिरमें सिद्ध बननेके लिये, हाथ पाँव प्रभृति कर्मैन्द्रियोंसे काम नहीं लेते, किन्तु मनमें भाँति-भाँतिके इन्द्रिय-विषयोंको इच्छा किया करते हैं । भगवान् कृष्ण ऐसोंको पाखण्डी कहते हैं ।

सबसे अच्छा और सिद्ध पुरुष वही है, जो जाहिरा तो काम करता है, किन्तु अन्दरसे मन और ज्ञानैन्द्रियोंको विषय-वासनासे रोकता है । गीतामें कहा है :—

यत्स्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन ।

कर्मैन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥७॥