भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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हे अर्जुन ! जो मनसे आँख कान नाक आदि इन्द्रियों को वशमें करके और इन्द्रियोंके विषयोंमें मन न लगा कर “कर्म-योग” करता है,—वही श्रेष्ठ है ।

रहीमने यही बात कैसी अच्छी तरह कही है :—

जा “रहीम” मन हाथ है, मनसा कहुँ किन जाहिं ।

जलमें छाया जा परी, काया भीजत नाहिं ॥

तनको योगी सब करें, मनको विरला कैय ।

सहजे सब सिधि पाइये, जा मन योगी होय ॥

मतलब यह है, कि दौंग करनेसे कोई लाभ नहीं । जिनका दिल साफ है, जिनके दिलसे वासनायें निकल गई हैं, उन्हें नहाने धोने प्रभृति विबाध कामों या दूकानदारीकी ज़रूरत नहीं है । रहीम कहते हैं, मन यदि हाथमें है तो मनसा कहीं क्यों न जाय, हानि नहीं ; क्योंकि जलमें शरीरकी परछाईं पड़ने से शरीर नहीं भीजता । लोग शरीरको जोगी करते हैं,—तिलक छापे लगाते हैं, जटाजूट बढ़ाते हैं, नेत्रोंको सुखें करते हैं, भभूत मलते हैं, कोपीन बाँधते हैं ; पर मनको कोई विरलाही जोगी करता है । लोग ऊपरसे योगी बन जाते हैं, पर मन उनका विषय-भोगोंमें लगा रहता है । शरीरसे चाहे जो काम क्यों न किये जायें, पर मनमें विषयोंकी कामना न रहे ; यानी शरीर जोगी न हो, मन जोगी हो जाय ; तो सिद्धि या मोक्ष मिलनेमें सन्देह नहीं । सारांश यह कि, मनके योगी होनेसे ही ईश्वर मिलता है ।