वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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महाकवि जौक कहते हैं :—
सरापा पाक हैं धोये जिन्होंने हाथ दुनियासे ।
नहीं हाजत कि वह पानी बहयें सरसे पाऊँ तक ॥
जिन्होंने दुनियासे हाथ धो लिये हैं, वे सिरसे पाँव तक शुद्ध हो गये हैं। उन्हें सिरसे पाँव तक पानी बहाकर ज्ञान करनेकी जरूरत नहीं।
मन जब वासना-हीन हो जाता है, तब वह सूखी दिया-सलाईके समान हो जाता है। सूखी दियासलाई जिस तरह भट जल उठती है, पर गीली नहीं जलती; उसी तरह वासना-हीन मन पर परमात्माका रङ्ग जल्दी चढ़ता है; किन्तु वासना-युक्त मन पर हरगिज़ नहीं। इसलिये मनको वासना-हीन करना चाहिये। साथ ही भक्ति भी निष्कास करनी चाहिये। ईश्वरसे मुसाद न माँगनी चाहिये। कामना रख कर भक्ति करनेसे कामना निश्चय ही पूर्ण होती है—ईश्वर भक्तकी इच्छा अवश्य पूरी करता है; पर वैसी भक्तिये परिणाममें भय है; क्योंकि फलोंके भोगनेके लिये जन्मना और मरना पड़ता है। किन्तु जो लोग बिना किसी इच्छाके परमात्माकी भक्ति करते हैं, वे मुक्ति लाभ करते हैं—उन्हें जन्म लेना और मरना नहीं पड़ता।
जब साधकके मनमें कुछ कामना नहीं रहती, तब उसके मनसे ईर्षा-द्वेष और मित्रता-शत्रुता सब दूर हो जाती हैं। वह