भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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सब जगत्को एक नज़रसे देखता है। वह मनुष्योंकी आशा नहीं रखता, केवल परमात्माको शरण ले लेता है; इसलिये उसे सहजमें मुक्ति मिल जाती है। गोस्वामी तुलसीदासजीने कहा है :—

तव लागि हमते सब बड़े, जब लागि है कुछ चाह ।

चाह-रहित कहको अधिक, पाय परमपद थाह ॥

जब तक मनमें इरा भी आशा रहती है, तभीतक मनुष्य किसीको बड़ा मानता है और किसीका दास बनता है; जब आशा नहीं रहती, तब वह सबको स्वप्न समझता है और सबका आसरा छोड़ एक मात्र परमात्माका आसरा पकड़ता है; इससे उसको, भववन्धनसे छुटकारा मिलकर, परम पदकी प्राप्ति हो जाती है।

क्षपय ।

कथा अरु कोपीन, फटी पुनि महा पुरानी ।

बिना याचना भीख, नींद मरघट मनमानी ॥

रह जग सों निश्चित, फिर जितही मन आवै ।

राखे चितकूँ शान्त, अनुचित नहि भावै ॥

जो रहें लीन यस ब्रह्ममें, सोवत अरु जागत यदा ।

है राज तुच्छ तिहुँ भुवनको, ऐसे पुरुषन कों तदा ॥१०१॥

101. Happy is the recluse who wears a totally worn out loin-cloth, torn into a hundred pieces as well as a covering