वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
( ३४१ )
सब जगत्को एक नज़रसे देखता है। वह मनुष्योंकी आशा नहीं रखता, केवल परमात्माको शरण ले लेता है; इसलिये उसे सहजमें मुक्ति मिल जाती है। गोस्वामी तुलसीदासजीने कहा है :—
तव लागि हमते सब बड़े, जब लागि है कुछ चाह ।
चाह-रहित कहको अधिक, पाय परमपद थाह ॥
जब तक मनमें इरा भी आशा रहती है, तभीतक मनुष्य किसीको बड़ा मानता है और किसीका दास बनता है; जब आशा नहीं रहती, तब वह सबको स्वप्न समझता है और सबका आसरा छोड़ एक मात्र परमात्माका आसरा पकड़ता है; इससे उसको, भववन्धनसे छुटकारा मिलकर, परम पदकी प्राप्ति हो जाती है।
क्षपय ।
कथा अरु कोपीन, फटी पुनि महा पुरानी ।
बिना याचना भीख, नींद मरघट मनमानी ॥
रह जग सों निश्चित, फिर जितही मन आवै ।
राखे चितकूँ शान्त, अनुचित नहि भावै ॥
जो रहें लीन यस ब्रह्ममें, सोवत अरु जागत यदा ।
है राज तुच्छ तिहुँ भुवनको, ऐसे पुरुषन कों तदा ॥१०१॥
101. Happy is the recluse who wears a totally worn out loin-cloth, torn into a hundred pieces as well as a covering
( ३४२ )
sheet in the same tattered condition, who is free from cares and eats food easily got by begging, who sleeps in a cremation-ground or a forest, who is indifferent to friends as well as to foes, who sits in contemplation in a lonely cottage and whose vanity and passions have been totally destroyed,
भोगा भंगुरवृत्तयो बहुविधास्तैरेव चायं भव-
स्तत्कस्यैव कृते परिश्रमतरे लोका कृतं चेष्टितैः ॥
आशापाशशतोपशान्तिविशदं चेतः समाधीयतां
कायोच्छितिवशे स्वधामनि यदि श्रद्धेयसम्पद्भूचः ॥१०२॥
नाना प्रकारके विषय-भोग नाशमान और संसार-बन्धनके कारण हैं, इस बातको जान कर भी मनुष्यो ! उनके चक्रमें क्यों पड़ते हो ? इस चेष्टासे क्या लाभ होगा ? अगर आपको हमारी बातका विश्वास हो, तो आप अनेक प्रकारके आशा-जालके टूटनेसे मुद्ध हुए चित्तको सदा कामनाशक स्वयंप्रकाश शिवजीके चरणोंमें लगाओ। ( अथवा अपनी इच्छाओंके समूल नाश करनेके लिए, अपने ही आत्माके ध्यानमें मग्न हो जाओ ) ॥१०२॥
आप आज जिन विषय-सुखोंको देखकर फूँले नहीं समाते, वे विषय-सुख सदा आपके साथ नहीं रहेंगे। वे आज हैं, तो कल नहीं रहेंगे। वे बिजलीकी चमकके समान चञ्चल हैं, अभी बिजली चमकी और फिर नहीं। आप ऐसे नश्वर, असार, क्षणस्थायी सुखों पर मत भूलो। होश करो ! आपकी काया
( ३४३ )
नाशमान् है। आप सदा इस संसारमें नहीं रहेंगे। आपकी जिन्दगीका कोई भरोसा नहीं। आपका जो दम आता है, उसे ही गनीमत समझिये। आप एक क्रुद्ध रखकर, दूसरा क्रुद्ध रखनेकी भी दृढ़ आशा न कीजिये। आपका जीवन हवाके भोंकोंसे छिन्न-भिन्न मेघोंके समान है। अभी घटा छा रही थीं; देखते-देखते हवा उन्हें कहाँ-का कहाँ उड़ा ले गई; आकाश साफ हो गया। यह सारा संसार, संसारके सुख-भोग और स्त्री-पुत्र धन-रत्नादि सभी स्वप्नकी सी माया है। यह दुनिया मुसाफिरखाना है। रोज़ अनेक आदमी मुसाफिरखाने, सराय या धर्मशालाओंमें आते और जाते हैं; सदा उनमें कोई नहीं रहता। वे जिस तरह एक दिन या दो तीन दिन ठहर कर चले जाते हैं; उसी तरह आपको भी, इस दुनिया-रूपी सरायमें चन्द रोज़ क़याम करके, आगे जाने होगा। ये सारे सामान यहाँ के यहीं रह जायेंगे। ये सब पैसे हो रहेंगे, पर आप न रहेंगे। इसलिये आप होशियार रहिये, भूलिये मत। आप आज जिस जवानी पर इतने इतराते और इतने श्रद्धार-बनाव करते हैं, यह भी चन्दरोज़ा है। यह चार दिनकी चाँदनी है। इसके बाद अँधेरी रात निश्चयही आवेगी; अर्थात् इसके बाद बुढ़ापा अवश्य आवेगा। उस समय आपको यह अकड़, यह उल्लू-कुद, यह पेटना, यह सूठे मरोड़ना—सब हवा हो जायगा। आप शीघ्र ही लाठी टेक कर चलने लगेगे। आपका रूप-लावण्य नाश हो जायगा। जो लोग आपको खूबसूरत समझकर आज
इती (२)
एक
ता, के
कि
( ३४४ )
द्वार करते हैं, वे ही कल आपको देखकर नाक भौं सिकोड़ेगे। फिर भला, आप ऐसी नश्वर निकम्मी काया पर क्यों इतना अभिमान करते हैं? आप अहङ्कारको त्यागिये और अपने लिये उस खिलाड़ीका एक मिट्टीका पुतला-मात्र समझिये। सबकी शुभ कामना और परोपकार कीजिये, और एकमात्र अपने बानेवालेसे ही दिल लगाइये। इसीमें आपका कल्याण है। यह जगत् कुछ भी नहीं, कोरा भ्रम है। यह मृगमरीचिका या स्रम कीसी माया है। इस पर ज्ञानी नहीं भूलते। महात्मा सुन्दरदास जी कहते हैं :—
कोऊ रुप फूलन की सेज पर सुतो आइ । जब लग जाग्योतौ लों, अति सुख मान्यो है ॥ नींद जब आई, तब वाही कैं स्वपन भयो । जब प्रयो नरकके कुण्डमें, चूँ जान्यो है ॥ अति दुःख पावे, पर निकस्यो न कयूँ ही जाहि । जागि जब प्रयो, तब स्वपन बखान्यो है ॥ यह झूठ वह झूठ, जाग्रत स्वपन दोऊ । “सुन्दर” कहत, ज्ञानी सब भ्रम मान्यो है ॥
व्यपय ।
अति चंचल ये भोग, जगतहूँ चंचल तैसों । तू क्यों भटकत मूढ़ जीव, संसारी जैसों ॥
( ३४५ )
आशाफ़ाँसी काट, चिच्च तू निर्मल हवैरे ।
साधन साधि समाधि, परम निज पदको हवैरे ॥
करि रे प्रतीति मेरे बचन, डुरिरे तू इह ओरको ।
छित यहै यहै दिनहूँ भल्यो, निज राखै कछु भोरको ॥१०२॥
102. The various kinds of sensual pleasures are liable to destruction. They are the causes of worldly bondage, what for, O men, then do you wander about so busily? If you trust upon my word, then it is better for you to fix your mind, made pure by the calming down of the hundredfold network of hopes, in contemplation within your own Self for the extermination of your desires.
धन्यानां गिरिकन्दरे निवसतां ज्योतिः परं ध्यायता-
मानन्दाश्रुजलं पिबन्ति शकुना निःशंकमङ्केशयाः ॥
ब्रह्माकं तु मनोरथोपरचितभासादवापीत-
क्रीडांकाननकैलिकौतुकजुषामायुः परिचीयते ॥१०३॥
वे धन्य हैं, जो पर्वतोंकी-गुफाओंमें रहते हैं और परमब्रह्मकी ज्योतिका ध्यान करते हैं, जिनके आनन्दाश्रुओंको उनकी गोदमें बैठे हुए पत्नी निर्भयतासे पीते हैं । हमारी जिन्दगी तो मनोरथोंके महलकी नावड़ीके किनारेके क्रीडा-स्थानमें लीलायें करते हुए ही बुथा बीतती है ॥१०३॥
मतलब यह, कि वे लोग सफल-काम हैं, जो पहाड़ोंकी गुफाओंमें बैठे हुए परमात्माका ज्योतिका ध्यान करते रहते
( ३४६ )
हैं और उस ध्यानमें इतने मग्न हो जाते हैं, कि उन्हें अपने तनोबदनकी भी सुख नहीं रहती। उनको भीतर-ही-भीतर उस ब्रह्मके ध्यानसे जो आनन्द बोध होता है, उससे उनकी आँखोंसे आनन्दके आँसू बहने लगते हैं। पक्षी उनकी गोद में निडर बैठे हुए उन आँसुओंको पीते हैं। उन्हें कुछ खबर नहीं, कि पक्षी गोदमें बैठे हैं या क्या कर रहे हैं। वे तो आनन्दमें बेसुख रहते हैं। यही आनन्द परमानन्द है; इससे परे और आनन्द नहीं। जिनको यह सच्चा आनन्द मिलता है, वही सच्चे भाग्यवान हैं। एक वह है और एक हम अभागे हैं, जो रात-दिन मनोरथांके महल गढ़ा करते हैं—रात-दिन मिथ्या कल्पनायें किया करते हैं। इन शोखबिल्लीके से गढ़न्तोंसे हमें कोई लाभ नहीं—इन भूटे खयाली बुलावोंके पकानेमें हमारा दुष्प्राप्य जीवन वृथा नष्ट होता है !
जो मनुष्य मानव-चोला पाकर परमात्माका भजन नहीं करते, परमात्माके दर्शनोंकी खेष्टा नहीं करते—उनका जीवन वृथा है। इसलिये उस्ताद ज़ौकने कहा है :—
दिल वह क्या, जिसको नहीं तेरी तमनाये विसाल ।
चश्म वह क्या, जिसको तेरे दीदकी हसरत नहीं ॥
वह दिल ही नहीं, जिसे तेरे पानेकी इच्छा न हो और वह आँख ही नहीं, जिसे तेरे दर्शनकी लालसा न हो ।
( ३४७ )
बीती सो बीती, अब तो होश करो !
भाइयो ! बीतीसो बीती, अब तो चेत करो और प्रभुसे लौ लगाओ । आज-कल मत करो, नहीं तो पछताओगे । अन्त समय पछतानेसे कोई लाभ न होगा । जो लोग विचार ही विचार करते रहते हैं, वे धोखेमें रह जाते हैं और काल एक दिन अबानक आकर उनकी चोटी पकड़ लेता है । गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं :—
गये पलट आवें नहीं, सो कर मन पहचान ।
ब्राजु जोई सोई कालुहि है, तुलसी भर्म न मान ॥
रामनाम रटिबो भलो, तुलसी ख़ता न खाय ।
लरिकाईं तैं पैरिबो, धोखे बूढ़ि न जाय ॥
नदीकी जो धार चली गई है, लौटकर नहीं आयेगी । जो दिन चले गये हैं, वापस नहीं आयेंगे । जो दिन आज हैं, वही कल है । कल कोई नई बात नहीं हो जायगी । अतः जो कल करना है, उसे आजही करो ; और जो आज करना है, उसे अभी करो ; क्योंकि यदि पल भरमें प्रलय हो गई—आप चले बसे, तो फिर कब करोगे ? वचपनसे ही राम नाम रटना अच्छा है । जो लोग वचपनसे ही तेरन्ध सीख लेते हैं, धोखेसे नहीं डूबते । जो लोग यही विचार किया करते हैं, कि अमुक काम
इती (२)
एक
ता, के रन्तु तत, रन्तु रना
कि के
( ३४८ )
हो जायगा, तो उसके बाद हम सब गृहस्थीके भगड़े छोड़ भगवत् भजन करेंगे, वे इस तरहके विचार किया ही करते हैं कि, इतने में उनका समय पूरा हो जाता है और काल उनका चोटा पकड़ कर उन्हें लेजाता है। उस वक्त वह बहुत पछताते और सिर धुनते हैं, लेकिन उस समय हो क्या सकता है ? उस समय उनकी गति उस भौरैकी सी होती है, जो कमलके मुखमें बन्द होकर कहता है :—
रात्रिर्गमिष्यति भविष्यति सुप्रभातं ।
भास्वानुदेष्यति हसिष्यति पंकजालम् ॥
इत्थं विचिन्तयति कोशागते द्विषेपे ।
हा हन्त हन्त नलिनीं गज उज्जहार ॥
बड़े-बड़े शालके लहड़ोंको छेद डालनेकी शक्ति रखनेवाला भौरा, प्रेमके सारे, कोमल कमलमें बन्द हो जाता है। रात हो जाती है और भौरा कमलके भीतर बैठा हुआ विचार करता है :—“अब रातका अवसान होगा, सवेरा होगा, सूरज उदय होगा और यह कमल खिल जायगा ; तब मैं निकल जाऊँगा। अब रात-भर यहीं आनन्द करूँ।” वह तो ऐसे विचार करता ही रहता है, कि जड़ूली हाथी कमलको उखाड़कर मुँहमें रख लेता है और भौरैके मन-की-मनमें ही रह जाती है। यही वंशा संसारी विषय-लोलुपों की है ! वह विचार बांधा ही करते हैं और काल उन्हें मुँहमें धर लेता है। अतः हो सके
वैराग्यशतक ~~~~~
इती (२) ॥
एक
ता, न के
भौरा कमल में बँटा हुआ अनेक तरह के विचार करता है, हतने में हाथी आकर भौरा समेत कमल को खाजाता है। यही दशा हमारी है। हम रात-दिन विषय-भोगों में लगे रहते हैं और मृत्यु अचानक आकर हमें लील जाती है।
(पृष्ठ ३६६)
A high-contrast, black and white photograph of a blank page, possibly from a book or notebook. The page is held open by a hand visible on the left side. The right edge shows the binding mechanism, including a metal clip and a small metal ring. The page itself is mostly white with some faint, illegible markings near the bottom center.
( ३४६ )
तो, बचपनमें ही ईश्वर-भजन करो। बचपनमें यदि ऐसा सौभाग्य न हो, तो जवानीमें तो न रूको। जवानी इसके लिये अच्छा समय हैं। उस अवस्थामें शक्ति रहती है। जवानीमें ईश्वर-भक्ति करनेवाला निश्चय ही मोक्ष या स्वर्ग पाता है। कहा है :—
दानं दरिद्रस्य प्रभोश्च शान्तिः
यूनां तपो ज्ञानवताच्च मौनम् ।
इच्छा निवृत्तिश्च सुखासितानां
दया च भूतेषु दिवं नयन्ति ॥
दरिद्रताका किया दान, निग्रह अनुग्रहकी शक्ति होनेपर क्षमा, जवानीका किया तप, विद्वान् होकर चुप रहना, सुख-भोगकी सामर्थ्य होनेपर इच्छाओंको रोक लेना और प्राणियों पर दया करना—ये स्वर्गकी प्राप्ति कराते हैं।
ईश्वर-भजनमें आज-कल मृत करो।
एक धनवान सदा घर-धन्योमें लीन रहता था। उसकी स्त्री उससे बहुत-कुछ कहती कि, हे स्वामी ! यह शरीर विषय-भोगोंके लिये नहीं, बल्कि परमात्माकी भक्तिके लिये मिला है। इसे पारस-मणि समझकर, इससे मोक्ष-रूपी सोना बना
इती (२)
॥
एक
ता, व के रन्नु सत, रन्नु रना
ीकि सके
( ३५० )
लौजिये । ऐसा न हो कि, आप सोना न बनावें और यह पारख-मणि पहले ही आपसे छीन ली जाय । इस शरीरका बारम्बार मिलना कठिन है। ८४ लाख योनियों भोगनेके बाद यह मनुष्य-चोला मिला है। इस बार यदि इससे काम न लिया जायगा, तो फिर चौरासों लाख योनियोंमें जन्म-मरण होनेपर यह मनुष्य-चोला मिलेगा ; इसलिये दो बार घड़ी तो सब तरफसे मनको हटाकर परमात्माकी याद किया करो । लौ उससे बार बार कहती, पर वह सेठ उसकी बात टाल देता ।
एक दिन सेठ बीमार हो गया । उसने सेठानीसे वैद्यके बुलानेको कहा । सेठानीने वैद्यको बुलाया । वैद्यने नाड़ी नज्ज देख, रोगका हाल पूछ, दवाका नुसखा लिख दिया और सेवन-विधि बताकर चला गया । सेठानीने पंसारीके यहाँ से दवा मँगा, आठेमें रख दी । दिन-भर हो गया, पर सेठको दवा न दी । सन्ध्या-समय सेठने कहा—“क्या दवा नहीं मँगाई गई ?” सेठानीने कहा—“जी, दवा तो मँगाली है, पर वह रखी है उस ताकमें ।” सेठने पूछा—“अबतक दी क्यों नहीं ?” सेठानीने कहा—“जल्दी क्या है ? आज नहीं तो कल, नहीं तो परसों दे दूँगी । कभी न कभी देही दूँगी ।” सेठने कहा—“अगर मैं मर गया, तो दवा फिर कौन काम आवेगी ?” सेठानीने कहा—“मरनेको तो आप मानते ही नहीं । मैं जब-जब भगवत्-भजन करनेको कहती हूँ, तब-तब आप कह देते हैं कि, देखा
( ३५१ )
जायगा ; जल्दी थोड़े ही हैं । यदि आपको मरनेकी ही याद होती, तो ऐसा न कहते । आज दवाके लिये आपको मरनेकी याद आई है । जिस तरह दवाकी योगनाशके लिये ज़रूरत है ; उसी तरह भजनपूजनकी जन्म-मरणका फन्दा काटनेके लिये ज़रूरत है । ऐसा न हो कि, पशु-यौनि मिल जाय और सारा गुड़ गोबर हो जाय ।” आज स्त्रीका उपदेश लग गया । खेटको वराग्य हो गया । खेतानौने उसे दवा पिला दी और वह अच्छा भी हो गया । उसी दिनेसे उसने ईश्वर-भजनमें लौ लगादी । वह और सब भूला, पर ज़िन्दगी भर मौत और ईश्वरको न भूला ।
मौतको हरदम याद रखो ।
एक बाढ़शाहने अपने दरबार और बैठनेके स्थानोंमें कुम्बे बनवा-रक्खी थीं । वह चाहता था कि, मैं हरदम कुम्बों को देखकर मौत को न भूलूँ । मौतकी याद रहनेसे पापोंसे बचा रहूँगा और ईश्वरको न भूलूँगा । हमारे यहाँके अनेक सच्चे सिद्ध अकसर श्मशान भूमिमें ही अपना डेरा रखते हैं । सारांश यह, मनुष्यको अपनी मौतकी याद सदा रखनी चाहिये, ताकि संसारसे वैराग्य होकर ज्ञान हो और ज्ञानसे मोक्ष मिले । महात्मा कबीरने पूर्व ज़बर्दस्त चेतावनी दी है :—
( ३५२ )
“कबिरा” जो दिन आज है, सो दिन नौही काल ।
चेत सके तो चेतियो, मीच परी है ख्याल ॥
हे कबीर ! जो दिन आज है, वह कल नहीं होगा ; यानी आजका सा मौका फिर कल न मिलेगा। चेतना है तो चेत जा ! देख, मृत्यु तेरी धातमें है। वृहस्पति बिछीकी तरह ऋषड़ा मारना ही चाहती है।
गोस्वामीजीने भी खूब कहा है :—
“तुलसी” बिलंब न कीजिये, भज लीजै रघुवीर ।
तन तरकसते जात है, श्वास सार सो तीर ॥
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब ।
पलमें परलय होयगी, बहुरि करोगे कव ?
तुलसीदासजी कहते हैं, देर न करो, भगवान्को भज लो ; क्योंकि तन-रूपी तरकससे श्वास-रूपी तीर, जो सार है, निकला जाता है। जो काम कल करना है, उसे आज ही कर डालो और जो आज करना है, उसे अभी कर डालो ; क्योंकि यदि पलमें प्रलय हो गई, तो फिर कब करोगे ?
जो मनुष्य दिन-रात घर अंधोंमें ही लगे रहते हैं, कभी खुश होते हैं, कभी रंज करते हैं, कभी कन्याके वैधन्य-दुःखको देखकर जलते रहते हैं, तो कभी पुत्रके मरणसे आँधा मुँह किये पड़े रहते हैं अथवा कान्ता-विभ्रमो या स्त्रीके मरणसे तड़फते हैं, अथवा धनवृद्धिके लिये दौड़ते फिरते हैं। लेकिन परमात्माका
( ३५३ )
नाम कभी नहीं लेते ; यदि लेते हैं तो हाथ को तो गोमुखीमें रखते ह, पर मनको विषयोंमें लगाने रहते हैं, लोगोंसे बातें करते रहते और सड़ासड़ माला फेरा करते हैं, ऐसोंके पास एक दिन भी चतुर पुरुषोंको न रहना चाहिये । कहा है :—
राजा धर्मविना, द्विजः शुचिविना, ज्ञानं विना योगिनः ।
कान्ता सत्यविना, ह्यो गति विना, भूषा च ज्योतिर्विना ॥
योद्धा शूरविना, तपो व्रत विना, छन्दो विना गीयते ।
भ्राता स्नेह विना, नरो हरि विना, मुञ्चन्ति शीघ्रं बुधाः ॥
धर्महीन राजाको, शौचहीन ब्राह्मणको, ज्ञानहीन योगीको, असत्यवादिनी स्त्री को, गतिहीन घोड़ेको, चमक-दमक रहित गहनेको, शूरताहीन योद्धाको, नियम रहित तप को, छन्द विना कविताको, स्नेह-हीन भाईको और हरिभक्ति रहित पुरुषको बुद्धिमान लोग शीघ्र ही छोड़ देते हैं ।
हरिभक्ति रहित पुरुषको चतुर लोग इसलिये त्याग देते हैं, कि उसकी संगतिमें उनका मन भी कहीं वैसा हो न हो जाय । मनुष्य जैसी सङ्कृति करता है, वैसा ही हो जाता है । जो विषयी पुरुषोंकी सङ्कृति करता है, वह विषयी हो जाता है ; पर जो ज्ञानी और वैरागियोंकी सङ्कृति करता है, वह ज्ञानी और वैरागी हो जाता है । महापुरुषोंकी एक शुभ दृष्टिसे मनुष्य निहाल हो जाता है ; यानी भूत-बन्धनसे उसका पीडा छूट जाता है । हम आगे दोनों तरहके दृष्टान्त देते हैं :—
२३
( ३५४ )
एक राजा और महात्मा ।
किसी जङ्गलमें एक महात्मा रहते थे। वह पेड़-पत्ते और हवा खाकर ज़िन्दगी बसर करते थे। उनकी शोहरत सारे देश में फैल गई। उस देशके राजाने भी उनसे मिलना चाहा। वज़ीरने यह खबर महात्माको दी। महात्मा उस जङ्गलको छोड़ भागनेको तैयार हुए; लेकिन मन्त्रीके बहुत समझाने-बुझानेसे वह वहाँ रह गये और राजाको दर्शन देने पर भी राजी हो गये।
एक दिन राजा अपने परिवार और दरबारियोंसमेत महात्मा के दर्शनको गया। महात्माके दर्शन कर वह बहुत ही खुश हुआ और उनसे नगरमें चलकर बागमें तप करनेकी प्रार्थना की। महात्मा बहुत जोर देनेसे इस बात पर राजी हो गया। राजाने अपने बागमें उसके लिये एक एकांत कमरा खूब सजवा दिया। मखमली गद्दे, तकिये, कौच, पलंग और कुरसियाँ रखवा दीं और चौदह-चौदह बरस की सुन्दरी मनमोहिनी कामिनियाँ महात्माजीकी सेवाको नियुक्त कर दीं।
महात्माजी खूब आनन्दसे दिन गुज़ारने और विधुबदनी कामिनियोंको भोगने लगे। चन्द्ररोज़में ही वह विषयोंके वशीभूत हो गये। एक दिन राजा फिर उनसे मिलने गया। उसने देखा कि, महात्माजीका रंग रूप गुलाबके फूल-जैसा
( ३५५ )
हो गया है। वह मसनदके सहारे लेटे हुए हैं और चन्द्रानना खियाँ उन पर मोरछल कर रही हैं। यह तमाशा देख राजा को बड़ा दुःख हुआ। उसने अपने मन्त्रीसे यह हाल कहा। मन्त्रीने कहा,—“महाराज ! निवृत्ति मार्ग वालोंको प्रवृत्ति मार्ग वालोंकी सङ्कृति भूलकर भी न करनी चाहिये। कहा है :—
“कामिनां कामिनीनां च संगत् कामी भवेत् पुमान् ।
देहान्तरे ततः क्रोधी लोभी मोही च जायते ॥
“काम क्रोधादि सांसर्गाद् शुद्ध जायते मनः ।
अशुद्धे मनसि ब्रह्मज्ञानं तच्च विनश्यति ॥”
कामी पुरुषों और खियोंकी सङ्कृतिसे पुरुष कामी और जन्मान्तरमें क्रोधी और मोही हो जाता है।
काम क्रोध आदिके सम्बन्धसे मन भी अशुद्ध हो जाता है। अशुद्ध मनसे उपदेश किया हुआ ब्रह्मज्ञान भी नष्ट हो जाता है।
—————— एक महात्मा और वेश्या।
एक महात्मा एक दिन वर्षामें भीगते हुए और कीचमें लिहूसे हुए एक मकानके छज्जेके नीचे जा खड़े हुए। वह मकान राजाकी वेश्याका था। महात्मा सदाँके मारे थर-
( ३५६ )
थर, थर-थर काँप रहे थे। वेश्याकी दासीने महात्माको देखा और अपनी स्वामिनीसे सारा हाल जा कहा। वेश्याने कहा—“जाओ, महात्माको लिवा लाओ।” दासी उन्हें ले आई। वेश्याने उनको स्नान कराकर नये कपड़े पहनाये और भोजन कराया। इसके बाद आप भोजन करके उनके पास गई और उन्हें पलंग पर लिटा कर उनके पैर दाबने लगी। महात्माने एक नज़र भरके वेश्याकी तरफ देखा और उसके हृदयमें अमृत की धारा बहा दी। वह सो गये और वेश्या रात-भर उनके बरण चापती रही। सबेरेंके बक्त वह सो गई और महात्मा उठकर बल दिये। भोरमें उठते ही वेश्याने दासीसे पूछा कि, महात्मा कहाँ गये? उसने कहा, कि वे तो चले गये। वेश्या उसी समय नड़ी होकर घरसे निकल गई और एक वृक्षके नीचे जाकर बैठ गई। राजाने यह समाचार सुनते ही अपने आदमी उसको लिवा लानेको भेजे। वेश्याने कहा—“राजासे कह दो, कि अब मैं आपका वह मैला उठानेवाड़ी पहलेकी भंगन नहीं हूँ।” राजाने यह बात सुन हुकम दे दिया कि, उसे कोई न छेड़े। अगले दिन वह कहीं चली गई। सब है, महापुरुषोंकी क्षणभरकी संगतिसे महापापी भी निहाल हो जाता है। निस्सन्देह सत्संग बड़ी बीज है। कहा है:—
महातुभावनसंगैः कस्य नोबतिकारकः ।
पद्मपत्रस्थितं वारिधरे मुक्ताफलश्रियम् ॥
( ३५७ )
महापुरुषोंको संगतितसे किसकी उन्नति नहीं होती ? कमलके पत्तेपर पड़ी जलकी बूँद मोतीकी शोभाको धारण करती है ।
और भी :—
॥ दोहा ॥
जेहि जैसी संगति करी, सो तैसो फल लीन ।
कदली सीप भुजंग-मुख, एक बूँद गुण तीन ॥
जो जैसी संगति करता है, वह वैसा ही फल पाता है । मेहकी एक बूँद केलेमें कपूर, सीपमें मोती और सर्प-मुखमें विष हो जाती है ।
सवैया ।
ज्ञान बढ़ै गुनवान की संगत,
ध्यान बढ़ै तपसी-संग कीने ।
मोह बढ़ै परिवार की संगत,
लोभ बढ़ै धन में चित दीने ॥
क्रोध बढ़ै नर मूढ की संगत,
काम बढ़ै तिथ के संग कीने ।
बुद्धि विवेक विचार बढ़ै,
कवि “दीन” सुसज्जन संगत कीने ॥
सत्संगकी महिमाका पार नहीं । सत्संगसे ही दृश्य भील
( ३५८ )
बाल्मीकि ऋषि हो गये । पद्मयोगिनेसे पैदा हुए ब्रह्मा, कैवर्त्ति से पैदा हुए व्यासजी, उर्वशीसे पैदा हुए वशिष्ठजी और हिरणी से पैदा हुए ऋषि भृङ्गी सत्संगसे ब्रह्मत्वको प्राप्त हुए ; अतः महापुरुषोंका संग करना चाहिये । “सत्संग” भवसागरसे पार करनेके लिये नौका-स्वरूप है । कहा है :—
तत्त्वं चिन्तय सततं चित्ते,
परिहर चिन्तां नश्वरचित्ते ।
क्षणमिह सज्जनसंगतिरेका
भवति भवार्थोवतरणे नौका ॥
इमेशा तत्त्वकी चिन्तना कर, चञ्चल धनकी चिन्ता छोड़ । यह जगत् अल्पकालीन है ; केवल सज्जनोंकी संगति ही भव-सागरके पार जानेके लिये नावके समान है ।
इस संसार-वृक्षके जितने फल हैं, सभी प्राणीके नाश करने वाले और उसे सदा दुःखोंके गर्तमें पटक रखनेवाले हैं ; केवल दो फल अमृत-समान हैं ; कहा है :—
संसार-विष-वृक्षस्य द्वे फले अमृतोपमं ।
‘काव्यामृत रसास्वादं ब्राह्मणः सज्जनैः सह ॥
इस संसार-रूपी विष-वृक्षके दो फल अमृतके समान हैं :—
(१) काव्यरूपी अमृतका रसास्वादन करना, (२) साधु पुरुषों की सद्गति करना ।