वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ३५२ )
“कबिरा” जो दिन आज है, सो दिन नौही काल ।
चेत सके तो चेतियो, मीच परी है ख्याल ॥
हे कबीर ! जो दिन आज है, वह कल नहीं होगा ; यानी आजका सा मौका फिर कल न मिलेगा। चेतना है तो चेत जा ! देख, मृत्यु तेरी धातमें है। वृहस्पति बिछीकी तरह ऋषड़ा मारना ही चाहती है।
गोस्वामीजीने भी खूब कहा है :—
“तुलसी” बिलंब न कीजिये, भज लीजै रघुवीर ।
तन तरकसते जात है, श्वास सार सो तीर ॥
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब ।
पलमें परलय होयगी, बहुरि करोगे कव ?
तुलसीदासजी कहते हैं, देर न करो, भगवान्को भज लो ; क्योंकि तन-रूपी तरकससे श्वास-रूपी तीर, जो सार है, निकला जाता है। जो काम कल करना है, उसे आज ही कर डालो और जो आज करना है, उसे अभी कर डालो ; क्योंकि यदि पलमें प्रलय हो गई, तो फिर कब करोगे ?
जो मनुष्य दिन-रात घर अंधोंमें ही लगे रहते हैं, कभी खुश होते हैं, कभी रंज करते हैं, कभी कन्याके वैधन्य-दुःखको देखकर जलते रहते हैं, तो कभी पुत्रके मरणसे आँधा मुँह किये पड़े रहते हैं अथवा कान्ता-विभ्रमो या स्त्रीके मरणसे तड़फते हैं, अथवा धनवृद्धिके लिये दौड़ते फिरते हैं। लेकिन परमात्माका