भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

पृष्ठ 466, कुल 648 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 466

( ३५२ )

“कबिरा” जो दिन आज है, सो दिन नौही काल ।

चेत सके तो चेतियो, मीच परी है ख्याल ॥

हे कबीर ! जो दिन आज है, वह कल नहीं होगा ; यानी आजका सा मौका फिर कल न मिलेगा। चेतना है तो चेत जा ! देख, मृत्यु तेरी धातमें है। वृहस्पति बिछीकी तरह ऋषड़ा मारना ही चाहती है।

गोस्वामीजीने भी खूब कहा है :—

“तुलसी” बिलंब न कीजिये, भज लीजै रघुवीर ।

तन तरकसते जात है, श्वास सार सो तीर ॥

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब ।

पलमें परलय होयगी, बहुरि करोगे कव ?

तुलसीदासजी कहते हैं, देर न करो, भगवान्को भज लो ; क्योंकि तन-रूपी तरकससे श्वास-रूपी तीर, जो सार है, निकला जाता है। जो काम कल करना है, उसे आज ही कर डालो और जो आज करना है, उसे अभी कर डालो ; क्योंकि यदि पलमें प्रलय हो गई, तो फिर कब करोगे ?

जो मनुष्य दिन-रात घर अंधोंमें ही लगे रहते हैं, कभी खुश होते हैं, कभी रंज करते हैं, कभी कन्याके वैधन्य-दुःखको देखकर जलते रहते हैं, तो कभी पुत्रके मरणसे आँधा मुँह किये पड़े रहते हैं अथवा कान्ता-विभ्रमो या स्त्रीके मरणसे तड़फते हैं, अथवा धनवृद्धिके लिये दौड़ते फिरते हैं। लेकिन परमात्माका