भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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नाम कभी नहीं लेते ; यदि लेते हैं तो हाथ को तो गोमुखीमें रखते ह, पर मनको विषयोंमें लगाने रहते हैं, लोगोंसे बातें करते रहते और सड़ासड़ माला फेरा करते हैं, ऐसोंके पास एक दिन भी चतुर पुरुषोंको न रहना चाहिये । कहा है :—

राजा धर्मविना, द्विजः शुचिविना, ज्ञानं विना योगिनः ।

कान्ता सत्यविना, ह्यो गति विना, भूषा च ज्योतिर्विना ॥

योद्धा शूरविना, तपो व्रत विना, छन्दो विना गीयते ।

भ्राता स्नेह विना, नरो हरि विना, मुञ्चन्ति शीघ्रं बुधाः ॥

धर्महीन राजाको, शौचहीन ब्राह्मणको, ज्ञानहीन योगीको, असत्यवादिनी स्त्री को, गतिहीन घोड़ेको, चमक-दमक रहित गहनेको, शूरताहीन योद्धाको, नियम रहित तप को, छन्द विना कविताको, स्नेह-हीन भाईको और हरिभक्ति रहित पुरुषको बुद्धिमान लोग शीघ्र ही छोड़ देते हैं ।

हरिभक्ति रहित पुरुषको चतुर लोग इसलिये त्याग देते हैं, कि उसकी संगतिमें उनका मन भी कहीं वैसा हो न हो जाय । मनुष्य जैसी सङ्कृति करता है, वैसा ही हो जाता है । जो विषयी पुरुषोंकी सङ्कृति करता है, वह विषयी हो जाता है ; पर जो ज्ञानी और वैरागियोंकी सङ्कृति करता है, वह ज्ञानी और वैरागी हो जाता है । महापुरुषोंकी एक शुभ दृष्टिसे मनुष्य निहाल हो जाता है ; यानी भूत-बन्धनसे उसका पीडा छूट जाता है । हम आगे दोनों तरहके दृष्टान्त देते हैं :—

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