भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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एक राजा और महात्मा ।

किसी जङ्गलमें एक महात्मा रहते थे। वह पेड़-पत्ते और हवा खाकर ज़िन्दगी बसर करते थे। उनकी शोहरत सारे देश में फैल गई। उस देशके राजाने भी उनसे मिलना चाहा। वज़ीरने यह खबर महात्माको दी। महात्मा उस जङ्गलको छोड़ भागनेको तैयार हुए; लेकिन मन्त्रीके बहुत समझाने-बुझानेसे वह वहाँ रह गये और राजाको दर्शन देने पर भी राजी हो गये।

एक दिन राजा अपने परिवार और दरबारियोंसमेत महात्मा के दर्शनको गया। महात्माके दर्शन कर वह बहुत ही खुश हुआ और उनसे नगरमें चलकर बागमें तप करनेकी प्रार्थना की। महात्मा बहुत जोर देनेसे इस बात पर राजी हो गया। राजाने अपने बागमें उसके लिये एक एकांत कमरा खूब सजवा दिया। मखमली गद्दे, तकिये, कौच, पलंग और कुरसियाँ रखवा दीं और चौदह-चौदह बरस की सुन्दरी मनमोहिनी कामिनियाँ महात्माजीकी सेवाको नियुक्त कर दीं।

महात्माजी खूब आनन्दसे दिन गुज़ारने और विधुबदनी कामिनियोंको भोगने लगे। चन्द्ररोज़में ही वह विषयोंके वशीभूत हो गये। एक दिन राजा फिर उनसे मिलने गया। उसने देखा कि, महात्माजीका रंग रूप गुलाबके फूल-जैसा

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