भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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हो गया है। वह मसनदके सहारे लेटे हुए हैं और चन्द्रानना खियाँ उन पर मोरछल कर रही हैं। यह तमाशा देख राजा को बड़ा दुःख हुआ। उसने अपने मन्त्रीसे यह हाल कहा। मन्त्रीने कहा,—“महाराज ! निवृत्ति मार्ग वालोंको प्रवृत्ति मार्ग वालोंकी सङ्कृति भूलकर भी न करनी चाहिये। कहा है :—

“कामिनां कामिनीनां च संगत् कामी भवेत् पुमान् ।

देहान्तरे ततः क्रोधी लोभी मोही च जायते ॥

“काम क्रोधादि सांसर्गाद् शुद्ध जायते मनः ।

अशुद्धे मनसि ब्रह्मज्ञानं तच्च विनश्यति ॥”

कामी पुरुषों और खियोंकी सङ्कृतिसे पुरुष कामी और जन्मान्तरमें क्रोधी और मोही हो जाता है।

काम क्रोध आदिके सम्बन्धसे मन भी अशुद्ध हो जाता है। अशुद्ध मनसे उपदेश किया हुआ ब्रह्मज्ञान भी नष्ट हो जाता है।

—————— एक महात्मा और वेश्या।

एक महात्मा एक दिन वर्षामें भीगते हुए और कीचमें लिहूसे हुए एक मकानके छज्जेके नीचे जा खड़े हुए। वह मकान राजाकी वेश्याका था। महात्मा सदाँके मारे थर-