वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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थर, थर-थर काँप रहे थे। वेश्याकी दासीने महात्माको देखा और अपनी स्वामिनीसे सारा हाल जा कहा। वेश्याने कहा—“जाओ, महात्माको लिवा लाओ।” दासी उन्हें ले आई। वेश्याने उनको स्नान कराकर नये कपड़े पहनाये और भोजन कराया। इसके बाद आप भोजन करके उनके पास गई और उन्हें पलंग पर लिटा कर उनके पैर दाबने लगी। महात्माने एक नज़र भरके वेश्याकी तरफ देखा और उसके हृदयमें अमृत की धारा बहा दी। वह सो गये और वेश्या रात-भर उनके बरण चापती रही। सबेरेंके बक्त वह सो गई और महात्मा उठकर बल दिये। भोरमें उठते ही वेश्याने दासीसे पूछा कि, महात्मा कहाँ गये? उसने कहा, कि वे तो चले गये। वेश्या उसी समय नड़ी होकर घरसे निकल गई और एक वृक्षके नीचे जाकर बैठ गई। राजाने यह समाचार सुनते ही अपने आदमी उसको लिवा लानेको भेजे। वेश्याने कहा—“राजासे कह दो, कि अब मैं आपका वह मैला उठानेवाड़ी पहलेकी भंगन नहीं हूँ।” राजाने यह बात सुन हुकम दे दिया कि, उसे कोई न छेड़े। अगले दिन वह कहीं चली गई। सब है, महापुरुषोंकी क्षणभरकी संगतिसे महापापी भी निहाल हो जाता है। निस्सन्देह सत्संग बड़ी बीज है। कहा है:—
महातुभावनसंगैः कस्य नोबतिकारकः ।
पद्मपत्रस्थितं वारिधरे मुक्ताफलश्रियम् ॥