भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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महापुरुषोंको संगतितसे किसकी उन्नति नहीं होती ? कमलके पत्तेपर पड़ी जलकी बूँद मोतीकी शोभाको धारण करती है ।

और भी :—

॥ दोहा ॥

जेहि जैसी संगति करी, सो तैसो फल लीन ।

कदली सीप भुजंग-मुख, एक बूँद गुण तीन ॥

जो जैसी संगति करता है, वह वैसा ही फल पाता है । मेहकी एक बूँद केलेमें कपूर, सीपमें मोती और सर्प-मुखमें विष हो जाती है ।

सवैया ।

ज्ञान बढ़ै गुनवान की संगत,

ध्यान बढ़ै तपसी-संग कीने ।

मोह बढ़ै परिवार की संगत,

लोभ बढ़ै धन में चित दीने ॥

क्रोध बढ़ै नर मूढ की संगत,

काम बढ़ै तिथ के संग कीने ।

बुद्धि विवेक विचार बढ़ै,

कवि “दीन” सुसज्जन संगत कीने ॥

सत्संगकी महिमाका पार नहीं । सत्संगसे ही दृश्य भील