भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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बाल्मीकि ऋषि हो गये । पद्मयोगिनेसे पैदा हुए ब्रह्मा, कैवर्त्ति से पैदा हुए व्यासजी, उर्वशीसे पैदा हुए वशिष्ठजी और हिरणी से पैदा हुए ऋषि भृङ्गी सत्संगसे ब्रह्मत्वको प्राप्त हुए ; अतः महापुरुषोंका संग करना चाहिये । “सत्संग” भवसागरसे पार करनेके लिये नौका-स्वरूप है । कहा है :—

तत्त्वं चिन्तय सततं चित्ते,

परिहर चिन्तां नश्वरचित्ते ।

क्षणमिह सज्जनसंगतिरेका

भवति भवार्थोवतरणे नौका ॥

इमेशा तत्त्वकी चिन्तना कर, चञ्चल धनकी चिन्ता छोड़ । यह जगत् अल्पकालीन है ; केवल सज्जनोंकी संगति ही भव-सागरके पार जानेके लिये नावके समान है ।

इस संसार-वृक्षके जितने फल हैं, सभी प्राणीके नाश करने वाले और उसे सदा दुःखोंके गर्तमें पटक रखनेवाले हैं ; केवल दो फल अमृत-समान हैं ; कहा है :—

संसार-विष-वृक्षस्य द्वे फले अमृतोपमं ।

‘काव्यामृत रसास्वादं ब्राह्मणः सज्जनैः सह ॥

इस संसार-रूपी विष-वृक्षके दो फल अमृतके समान हैं :—

(१) काव्यरूपी अमृतका रसास्वादन करना, (२) साधु पुरुषों की सद्गति करना ।

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