भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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शंकराचार्यजीने कैसा अच्छा उपदेश दिया है ! इसमें संसार-सागरसे पार होनेका सारा मसाला है :—

संगः सत्सु विधीयतां, भगवतोभक्तिर्दृढा धीयतां, शान्त्यादिः परिचीयतां, दृढतरं कर्माशु संत्यज्यताम् । सद्भिद्यो ह्युपसर्ज्यतां, प्रतिदिनं तत्पादुका सेव्यतां, वक्षैकाक्षरमर्थ्यतां श्रुतिशिरोवाक्यम् समाकश्यताम् ॥

साधु पुरुषोंका संग करना चाहिए । भगवानमें दृढ़ भक्ति करनी चाहिये । क्षमा और दम प्रभृतिका अभ्यास करना चाहिये । संसार-बन्धनके कारण “कर्म—सकाम कर्मोंको” शीघ्र त्यागना चाहिये । सच्चे विद्वानोंकी सेवा करनी चाहिये और उनकी पादुकाएँ उठानी चाहिये । ब्रह्म-बोधक एकाक्षर प्रणव “ॐ” का जाप करना चाहिए और वेदके शिरोवाक्य “वेदान्त” को सुनना चाहिये ।

वाह ! क्या लूब कहा है ! जो इस वचन पर अमल करेगा, उसे परमानन्दकी प्राप्ति क्यों न होगी ? अवश्य होगी ।

व्यप्यय ।

योगी जग विसराय, जाय गिरिगुहा वसत है ॥ करत ज्योतिको ध्यान, मगन आसू वरषत है ॥ खगकुल बैठत अंक, स्पियत निःशंक नयनजल । धनि धनि है वे धीर, धर्यो जिन यह समाधिबल ॥