वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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हम सेवत बारी बाग सर, सरिता बापी रूपतट । खोवत हैं योंहीं आयुको, भये निपटही नीरघट ॥१०३॥
103. Worthy of all praise are those who live in the caves of mountains and contemplate upon the Supreme Light and whose tears of joy are drunk by birds sitting fearlessly in their laps, while our lives are passing fruitlessly away in pursuing frolicksome avocations in the play-gardens, situated on the banks of the tank, belonging to the spacious mansion of Desire.
- आत्रांत मरणेन जन्म जरया विद्युच्चल यौवन संतोषो धनलिप्सया शमसुखं प्रौढांगनाविभ्रमैः ॥ लोकैर्मत्सरिभिर्गुणा वनसुखो व्यालैर्नृपा दुर्जनै- रस्यैर्येण विभृतिरप्यपहता प्रस्तं न किं केन वा ॥१०४॥
मृत्युने जन्मको प्रस रक्खा है, बुढ़ापेने बिजलीके समान चन्द्र-चल युवावस्थाको प्रस रक्खा है, धनकी इच्छाने सन्तोषको प्रस रक्खा है, स्त्रियोंके हावभावोंने मानसिक शान्तिको प्रस रक्खा है, जलनेवालोंने गुणोंको प्रस रक्खा है, सर्प और जंगली जानवरोंने वनको प्रस रक्खा है, दुष्टोंने राजाओंको प्रस रक्खा है, अस्थिरता या चन्द्र-चलताने धनैश्वर्य्यको प्रस रक्खा है ; तब ऐसी कौनसी अरुच्छी चीज है, जो किसी दूसरी नाशक चीजके चंगुलमें नहीं है ? ॥१०४॥
❖ आ-समन्तांत प्रातं-प्रस्तं ।