भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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खुलासा यह है, कि जन्मको मृत्युका भय है, जवानीको खुड़ापेका भय है, सन्तोषको लोभका भय है, शान्तिको ख़ियोकें हावभाव और विलासोंका भय है, गुणोंको उनसे जलने या कुड़नेवालोंका भय है, वनमें सर्प और हिंसक पशुओंका भय है, राजाओंमें दुष्ट दरबारियोंका भय है, धन और ऐश्वर्यमें क्षणभंगुरताका भय है। संसारमें ऐसी कोई अच्छी वस्तु नहीं है, जिसे किसीका भय न हो। मतलब यह है कि, संसार और संसारके सभी पदार्थ नाशमान हैं। ऐसी कोई वीज नहीं है, जिसका काल नाश नहीं कर देता, अथवा जिसे किसी तरहका भय नहीं है।

संसारकी यह दशा है, तब भी तो मनुष्य चेत नहीं करता, यही तो आश्चर्य की बात है ! अज्ञानी मनुष्य, मोहवश, अपना हानि-लाभ नहीं देखता ; संसारकी कूटी मायामें फँसा रहता है। तुलसीदासजीने ठीक ही कहा है :—

करत चातुरी मोहवश, लसत न निज हित हान ।

शूक मर्कट इव गहत हठ, तुलसी परम सुजान ॥

दुखिया सकल प्रकार शठ, समुक्ति परत तोड़ नाहिं ।

लसत न कण्टक पीन जिमि, ब्रशन भसत भ्रम नाहिं ॥

विषयोंके संसर्गसे मनुष्यके मनमें कामना—इच्छा पैदा होती है। जब इच्छा पूरी नहीं होती, तब क्रोध होता है और