भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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कोधसे मोहकी उत्पत्ति होती है। मोह होनेसे प्राणीको अपना हित या परलोककी हानि नहीं दिखती। राग द्वेष प्रभृतिके कारण उसमें ज्ञानदृष्टि नहीं रहती ; पर पढ़ने-लिखनेके कारण वह अपने तर्ह परम चतुर समझता है और जिस तरह हठ करके तोता बहेलियेके फन्देमें आप ही फँस जाता है और पीजरेमें कैद हो जाता है, तथा बन्दर छोटे मुँहकी डिलियामें रोटीके लिये हाथ डालकर बन्दरवालेके कून्जमें हो जाता है ; उसी तरह विषयी पुरुष, विषयोंके ठालचमें आकर, अपने तर्ह संसार-बन्धनमें फँसा लेता है।

मनुष्य भूख, प्यास, रोग, शोक, दृदिता, प्रिय-विद्योग, बुढ़ापा, जन्म-मरण, चौरासी लाख योनियोंमें दुःख-भोग तथा नरक प्रभृतिसे हर तरह दुखी है, उसे जरा भी सुख नहीं है, पर वह मोहके मारे ऐसा अन्धा हो रहा कि, उसे कौटिमें लगे चारोंके लिये फसने वाली मछलीकी तरह कुछ भी नहीं सूझता। जिस तरह मछलीको रोटीका टुकड़ा प्यारा है ; उसी तरह मनुष्य को विषय-भोग प्यारा है। जिस तरह मछलीको काँटा है, उसी तरह मनुष्यको ममता काँटा है। मतलब यह है, अज्ञानी मनुष्य विषय-रूपी चारोंके लोभसे ममताके कौटिमें फँसकर अपना नाश करता है ; पर मज्ञा यह कि वह दुःखको दुःख नहीं समझता ; तरह-तरहके भयोंसे घिरा हुआ नाना प्रकारके संकट झेलता है ; मछली, तोते और बन्दरकी तरह बन्धनमें फँसता है, पर निकलना नहीं चाहता। इन दुःखोंका उसे