भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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बुरा भी खयाल नहीं आता । रोज़ लोगोको मरते हुए देखता है, रोज़ बूढ़ोंको असह्य कष्ट उठाते देखता है ; पर आप नहीं समझता कि, मेरी भी यही गति होनेवाली है ! उल्टा हर साल जन्मतिथिको वर्ष-गौठका उत्सव करता है । मित्रों और रिश्तेदारोंको निमन्त्रण देता है । गाना बजाना और नाच रंग कराता है । कौसी बात है, जहाँ रंज करना चाहिये, वहाँ नादान मनुष्य खुशी मनाता है ! उसे समझना चाहिये, कि हर सालगिरहको उसकी उम्रका एक साल कम होता है । महात्मा सुन्दर दासजीने क्या खूब कहा है :—

जवतें जनम लेत, तबही तें आयु घटे । माई तो कहत, मेरो बड़ो होत जात है ॥ आज और काल और दिन-दिन होत और । दौरयो दौरयो फिरत, खेलत और खात है ॥ बालपन बीत्यो, जब यौवन लाग्यो है । यौवनहु बीते बूढ़ो डोकरो दिखात है ॥ “सुन्दर” कहत, ऐसे देखत ही बूझिगयो । तेल घटि गये; जैसे दीपक बुझात है ॥

प्राणी जबसे जन्म लेता है, तभीसे उसकी उम्र घटने लगती है । माँ समझती है कि, मेरा ठाल बढ़ा होता जाता है । दिन-दिन उसके रङ्ग बदलते हैं । बचपनमें खाता खेलता और भागा फिरता है । बचपनके बीतते ही जवानी आ जाती

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