भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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है और जवालीके बीतते ही बुढ़ापा आ जाता है और वह बूढ़ा ढोकरा खा दीखने लगता है। सुन्दरदास कहते हैं कि, देखते-देखते जिस तरह तेज घट जानेसे बिरागु बुझ जाता है, उसी तरह वह बुझ जाता है; यानी मर जाता है।

छप्पय ।

यस्यो जन्मको मृत्यु, जरा यौवनको यास्यो ।

यसिवैको सन्तोष, लोभ यह प्रगत प्रकास्यो ॥

तैसेही समष्टि यसित, बनिता विलास वर ।

मत्सर गुण यसिलेत, यसत बनको भुजंगवर ॥

रूप यसित किये इन दुर्जनन, कियों चपलता धन यसित ।

कछुहू न देख्यो बिन यसित जग, याही तें चित अति असित ॥१०४॥

104. Birth is threatened by death; youth which is transitory like lightning, by old age; contentment by greed for wealth; mental peace by the strong allurements of women; good qualities by jealous persons; forests by serpents and wild animals; kings by wicked courtiers and wealth and power by shortness of duration. What good thing exists there which does not lie in the clutches of something else capable of destroying it?

आविष्यायिशतेर्जनस्य विविधैरारोग्यमुन्मूल्यते

वत्सरीयत्र पतन्ति तत्र विद्वत्तद्वारा इव व्यापदः ॥

जातं जातभवन्यमाशुविवस्संभृत्युः करोत्यात्मसात्तर्क

नाम निरंकुशेन विधिना यन्निर्मितं सुस्थितम् ॥१०५॥