भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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सैकड़ों मानसिक और शारीरिक रोग स्वास्थ्यका नाश कर डालते हैं। जहाँ सम्पत्ति और प्रभुता है, वहाँ विपत्ति दरवाजा तोड़कर चोरकी तरह चढ़ाई करती है। जो जन्म लेता है, उसे मृत्यु शीघ्र ही ज्वरदंती अपने जाबड़ोंमें फँसा लेती हैं; तब निरङ्कुश विद्याताने सदा स्थायी रहनेवाली कौनसी चीज बनाई है ? || ०५ ||

मनुष्य-शरीर शर्माओंका घर है। मानसिक और कायिक रोग सदा उसके भीतर डेरा डाले रहते और स्वास्थ्यका नाश करते रहते हैं। सम्पत्ति पर विपत्ति सदा दृष्टि लगाये खड़ी रहती है और जरासा भी मौका पाते ही दरवाजा तोड़ कर उसका विनाश कर देती है। जन्म लेनेवालेके सिर पर मौत सदा मँडराया करती है एवं दाँव-घात देखती रहती है और जब मौका पाती है, उसे अपने पञ्चोंमें फँसा लेती है। सारांश यह कि, शरीरके साथ रोग, सम्पत्तिके साथ विपत्ति, जन्मके साथ मृत्यु, संयोगके साथ वियोग, सुखके साथ दुःख और जवानीके साथ बुढ़ापा प्रभृति एक दूसरेके नाशक विद्याताने लगा रखे हैं। विद्याताने कोई भी चीज सदा स्थायी नहीं बनाई; जो कुछ बनाया है वह चन्द्रोत्ता और नाशमान बनाया है।

संसारकी असावता देखकर, मनुष्यको अपने तर्ज, इस संसारमें, पाहुनेकी तरह समझना चाहिये। जिस तरह पाहुना