भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

पृष्ठ 480, कुल 648 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 480

( ३६६ )

जहाँ कहीं जाता है और जहाँ ठहरता है, वहाँ के लोगोंसे दिल नहीं लगाता ; उसी तरह समझदारोंको इस दुनियासे दिल न लगाना चाहिये ।

जिसको रहना उत घर, सो क्यों तोड़े मित्र । जैसे पर-घर पाहुना, रहै उठाये चित्त ॥ इत पर-घर उत है घरा, बनिजन आये हाट । कर्म करीना बेचिके, उठि करि चाले बाट ॥ मेरा संगी कोई नहीं, सबै स्वार्थी लोग । सुन परतीति न जपजे, जीव विश्वास न होय ॥ “कबिरा” ऐसा संसार है, जैसा सैमल-फूल । दिन दशके व्यौहारमें, मूठे रंग न भूल ॥

मनुष्यका अपना घर वह है जहाँसे वह आया है, यह नहीं ; अतः उसे अपने उस घरसे दिल न हटाना चाहिये । इस घरमें आकर मिहमानकी तरह रहना चाहिये और मिहमानकी तरह ही अपना दिल उठाये रखना चाहिये ।

यह पराया घर है और वह अपना घर है । यहाँ हाटमें अपना व्यवसाय करने आये हैं । हाटमें सौदा बेच कर अपनी राह लगेगे ; यानी इस दुनियामें अपने कर्माँका फल भोगकर यहाँसे चले जायेंगे ।

इस दुनियामें अपना कोई साथी नहीं है । सभी मतलबी यार हैं, और मतलबके लिये ही हमारे बन रहे हैं । सुनकर