वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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जहाँ कहीं जाता है और जहाँ ठहरता है, वहाँ के लोगोंसे दिल नहीं लगाता ; उसी तरह समझदारोंको इस दुनियासे दिल न लगाना चाहिये ।
जिसको रहना उत घर, सो क्यों तोड़े मित्र । जैसे पर-घर पाहुना, रहै उठाये चित्त ॥ इत पर-घर उत है घरा, बनिजन आये हाट । कर्म करीना बेचिके, उठि करि चाले बाट ॥ मेरा संगी कोई नहीं, सबै स्वार्थी लोग । सुन परतीति न जपजे, जीव विश्वास न होय ॥ “कबिरा” ऐसा संसार है, जैसा सैमल-फूल । दिन दशके व्यौहारमें, मूठे रंग न भूल ॥
मनुष्यका अपना घर वह है जहाँसे वह आया है, यह नहीं ; अतः उसे अपने उस घरसे दिल न हटाना चाहिये । इस घरमें आकर मिहमानकी तरह रहना चाहिये और मिहमानकी तरह ही अपना दिल उठाये रखना चाहिये ।
यह पराया घर है और वह अपना घर है । यहाँ हाटमें अपना व्यवसाय करने आये हैं । हाटमें सौदा बेच कर अपनी राह लगेगे ; यानी इस दुनियामें अपने कर्माँका फल भोगकर यहाँसे चले जायेंगे ।
इस दुनियामें अपना कोई साथी नहीं है । सभी मतलबी यार हैं, और मतलबके लिये ही हमारे बन रहे हैं । सुनकर
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प्रतीत नहीं होती और ज़ोमें विश्वास नहीं आता ; पर बात सच्ची है ।
कबीरदासजी कहते हैं,—यह संसार सेमलके फूलकी तरह है । दश दिनके व्यवहार और मेल-जोलखे मूठे रंग पर न भूलना चाहिये ।
सारंगश यह है कि, यह दुनिया परायार घर है और प्राणी-मात्र यहाँ मिहमान हैं ; अथवा यह संसार सराय है और हमलोग मुसाफिर हैं । यदि हम पाहुने हैं तो ; और यदि हम मुसाफिर हैं तो—दोनों हाथतोंमें ही—हमें इस दुनियासे दिल न लगाना चाहिये । हम जहाँसे आये हैं, अथवा जहाँ हमारा घर है, हमें अपना दिल वहाँके लिये ही उठाये रहना चाहिये ।
—————— दुनिया गोरख-धन्धा है । —○○○—
यह संसार बिल्कुल मिथ्या और असार है ; इसमें कुछ भी तत्त्व नहीं है । केलेके खंभे और लहसनको ज्यों-ज्यों छीलते जाइये, त्यों-त्यों उनके भीतरसे सिवां पत्तों और छिलकोंके कुछ भी नहीं निकलता । यह जगत् भी उनकी तरह ही सारहीन है । इसमें कुछ भी नहीं है । यह कोरा माया-जाल या घोखा है । इस गोरखधन्धेमें जो फँस जाते हैं, वे बुरी तरह नष्ट होते और अन्तमें पड़ताते हैं । इसलिये भाइयो ! इस माया-जालसे
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निकलनेकी चेष्टा करो । खूब खूबदार रहो ! इस जगत्के सभी सुख-भोग झूठे और प्राणीके पक्षमें अहितकर हैं । मि० आगा हथने थियेटरके गानेके तर्जमें क्या खूब कहा है :—
इस जालमें सब उलझाये, दुनिया है गोरखधन्वा । डाल रखा है सबने गलेमें, लोभ-मोहका फन्दा ॥ ये दुनियाँ हैं बुरका लड़ई; देखके जी ललचाये । ना खाये तौभी पढ़ताये, खाये तो पढ़ताये ॥ फिर भी सकल जगत है अन्ध । इस दुनियाके सुख भी झूठे, इसका प्यार भी झूठा ॥ सावधान हो ! इस ठगनीने बड़ों बड़ोंको लूटा । मूरख ! मत बन इसका बन्दा ॥
यह चोला परोपकार और ईश्वर-भजनके लिये भिला है ।
—◇◇◇◇—
आप जब इस दुनियामें आनेके लिये माँ के गर्भमें थे, तब आपने परमात्मासे प्रार्थना की थी, कि हे नाथ ! मुझे इस नरक-कुण्डसे निकालिये ; मैं दुनियामें जाकर माया-मोहमें न फँसकर, केवल आपको ही परिस्तिश और उपासना तथा जगत्के दूसरे प्राणियोंका उपकार करूँगा ; पर यहाँ आकर
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बचपन आपने खेल-कूदमें और जवानी लीके साथ पेश-आराम में बिता दी !! क्या आपको ऐसा ही करना चाहिये था ?
यह मंत्रुष्य-बोला इसलिये मिला है, कि मनुष्य । इस जगत्में दूसरों पाणियोंकी शुभचिन्तना करे और अपने कर्म-बन्धन काट कर परमपदकी प्राप्ति करे ; पर लोग तो इसको चमक-दमक कर ऐसे भूल जाते हैं, कि उन्हें अपनी आगेकी सफ़रका खयाल ही नहीं रहता । ऐसा समझने लगते हैं, मानो वह सदा यहीं रहेंगे । यहाँके लिप, जहाँ उन्हें बहुत ही थोड़े दिन रहना होता है, इतारों तरहके सामान करते हैं ; पर आगेकी लम्बी सफ़र के लिये कुछ भी नहीं करते ! यहाँके लिये इतना आड़म्बर और वहाँके लिये कुछ नहीं । यह चतुराई तो अच्छी नहीं मालूम होती । उस्ताद जौक ने कहा है :—
क्या यह दुनियाँ, जिसमें कोशिश हो न दीं के वास्ते ।
वास्ते वों के बी कुछ—या सब यहीं के वास्ते ॥
इस दुनियामें आकर कुछ परलोकके लिये भी करना चाहिये । यह नहीं, कि उधरकी फिक बिल्कुल ही न की जाय ।
हमें सृष्टिके प्रत्येक पदार्थ और नेचरके प्रत्येक कामसे परोपकारकी शिक्षा मिलती है । सूर्य परोपकारके लिये ही आकाशमें प्रमण करता है । चन्द्रमा परोपकारके लिये ही कष्ट सहकर जगत्में शीतल चाँदनी छिड़काता है । सितारे
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अँधेरी रातमें मुसाफिरोंको राह दिखानेके लिये ही रात-भर टिमटिमाते हैं। ध्रुव उत्तर दिशाका ज्ञान कराने और समुद्र के अगाध और अनन्त जलमें जहाजोंको राह दिखानेके लिये ही चमकता है। नदियाँ परोपकारके लिये ही बहती हैं। वृक्ष परोपकारके लिये ही फलते हैं। परोपकारके लिये ही, शेषजीने इस लम्बी-चौड़ी पृथिवीका भार अपने सहस्र फणों पर धारण कर रखा है। कच्छपने, परोपकारके लिये ही शेष समेत पृथ्वीका भार अपनी पीठ पर वहन कर रक्खा है। भगवान्ने परोपकारके लिये ही बारम्बार अवतार लेकर जन्म-मरणका कष्ट उठाया है। शिवि और दक्षोचिने परोपकारके लिये ही अपनी जानें दे दीं। किसी कविने कहा है :—
विरक्षा फलै न आप को, नदी न अचवे नीर । परोपकार के कारणे, सन्तन धरो शरीर ॥ शेष शीश धारे धरा, कहु न अपनो काज । परहित पर सारथी रथी, वाङ्क बने न लाज ॥
किसी जड़ुठमें चूहोंकी एक कृतार चली जाती थी। उनमें एक चूहा अन्ध था। उसके मुखमें एक तिनका पकड़कर, दूसरे चूहेने उसे अपने मुँहमें पकड़ रक्खा था। उसके सहारे अन्ध चूहा भी चला जाता था। यह जानवरोंका हाल है। पशुओंमें भी परोपकार-बुद्धि होती है। जो मनुष्य होकर परोप-
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कार शून्य है, वह पशुओंसे भी गया-बीता है। खासकर मनुष्य- देह तो परोपकारके लिये ही दी गयी है ; अतः मनुष्यको परोप- कार करना ही चाहिये। कहा है :—
परोपकारः कर्तव्यः श्रायौरपि धनैरपि ।
परोपकारंजं पुरयं न स्यात् ऋतुशतैरपि ॥
परोपकारशून्यस्य धिड्मनुष्यस्य जीवितम् ।
यावन्तः पशवस्तेषां चर्माप्युपकरिष्यति ॥
आत्मार्यं जीवलोकेऽस्मिन् को न जीवति मानवः ।
परं परोपकारार्थं यो जीवति स जीवति ॥
धन और प्राणोंसे परोपकार करना चाहिए ; क्योंकि परोप- कारके पुण्यके बराबर सौ यज्ञोंका भी पुण्य नहीं है।
परोपकार-शून्य मनुष्योंके जानेको भी धिक्कार है ! पशुओं- का चमड़ा भी पराये काम आता है।
अपने लिये इस लोकमें कौन नहीं जीता ? पराये लिये जो जीता है वही जीता है और तो मृतकवत् है।
सौ यज्ञोंका पुण्य भी परोपकार-जन्य पुण्यकी
बराबरी नहीं कर सकता।
एक वैश्यने अपने करोड़ों रुपये यज्ञोंमें खर्च कर दिये। शेषमें वह निर्धन हो गया। उसकी स्त्रीने उसे सलाह दी
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कि, तुम राजाको अपने दो चार यज्ञोंका फल देकर धन ले आओ, तो शेष जीवन सुखसे कट जाय। वैश्य राजी हो गया। सेठानीने उसे राहमें खानेके लिए नौ रोटियाँ रख दीं। वह वनमें पहुँच कर एक वृक्षके नीचे ठहर गया। वहाँ पानी जोरसे बरसनेके मारे राह न थी। उसी पेड़के खोंठरमें एक कुतिया व्यायी थी। वह वर्षाके मारे नौ दिनसे खूराककी तलाशमें कहीं जा न सकी थी; इसलिये भूखी मरणासन्न हो रही थी। वैश्यने उसे अपनी सब रोटियाँ खिलादीं और आप भूखा रह गया। वह भूखा-प्यासा राजाके पास पहुँचा और उसे अपनी राम-कहानी कह सुनाई। राजाने राज-ज्योतिषीसे पूछा—“इस सेठके कौनसे यज्ञका फल उत्तम है?” ज्योतिषीने कहा—“महाराज! इसने राहमें कुतियाको अपनी रोटियाँ खिलाकर जो उपकार किया है, उसीका फल उत्तम है; आप उसे ही खरीद लीजिये।” वैश्य उस परोपकारके पुण्य-फलको देने पर राजी न हुआ; तब राजाने उसे कई लक्ष सुद्रा देकर विदा किया। सारांश यह, कि संसारमें परोपकार और दयाके समान और पुण्य नहीं है। अतः मनुष्यको निःस्वार्थ भावसे परोपकार करना चाहिये। जो मनुष्य होकर परोपकार नहीं करता, उसका जन्म वृथा है।
‘किसीने कहा है :—
‘जातः कर्मः स एकः पृथुयुवनभरायापितं येन पृष्टं शलायं जन्म ध्रुवस्व प्रमति नियमितं यत्र तेजस्विक्वम् ॥’
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संजातव्यर्थपन्नाः परहितकरणे नोपरिष्टात्र चाधो ब्रह्मरहोडुम्भरान्तर्मशकवदपरे प्राणिनोजातनष्टाः ।
संसारमें उस प्रसिद्धः कलुषका जन्म ही सफल है, जिसने इस विशाल पृथ्वीका भार उठानेके लिये अपनी पीठ दे रखी है ; और इसी तरह ध्रुवका जन्म प्रशंसनीय है, जिसको बीच में लेकर सप्तश्रषियोंका ज्योति-मण्डल घूमता है । परोपकार करनेमें अशक्य मनुष्योंका जन्म इस ब्रह्माण्डमें गूठके बीचमें रहने वाले उन मच्छरोंके समान वृथा है, जो पंख सहित होनेपर भी कुछ नहीं कर सकते ।
अतः भाइयो ! स्त्री-पुत्र प्रभृतिके लिए अमूल्य जीवन वृथा नाश मत करो । ये आपके कोई नहीं । ये यहीं के साथी और बड़े स्वार्थी हैं ; परलोकमें आपके साथ न जायेंगे ; वहाँ केवल धर्म ही आपके साथ जायगा । मौत आपके लेजानेके लिए आना ही चाहती है । इसलिये चेत करो, आँखें खोलो, अब न सोओ । साँस-साँस पर जगदीशका सुमिरन करो और निष्काम भावले प्राणियों पर दया और परोपकार करो ; क्योंकि मरने पर ये ही आपके काम आयेगे ।
कविता या गानेको चीज़ोंका प्रभाव मनुष्य पर बड़ी जल्दी पड़ता है ; इसीसे हम चार-पाँच चिन्ताकर्षक और मोह-भञ्जन करनेवाले गाने नीचे देते हैं :—
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भजन ( रागविहाग )
हे मन गुमानी ! चेत कर ; हरिको सुमिर, हरिको सुमिर । बीती यह जाती है उमर ; हरिको सुमिर, हरिको सुमिर ॥१॥ नारी नरककी खान है ; जिसपर जगत गलतान है । इसका मज़ा इस आन है ; हरिको सुमिर, हरिको सुमिर ॥२॥ सुत बन्धु माता और पिता ; कुनवा कबीला आशन्नों । सब सुखके साथी हैं तेरे ; हरिको सुमिर, हरिको सुमिर ॥३॥ दुनियां कहौ क्या माल है ; मायाका फैला जाल है । इसपर तू क्या खुशहाल है ; हरिको सुमिर, हरिको सुमिर ॥३॥ कहना मेरा ले मान तू, हरगिज़ न कर अभिमान तू । एक प्रसुको सौंचा जान तू ; हरिको सुमिर, हरिको सुमिर ॥५॥
भजन ।
क्या देख दिवाना हुआ रे ॥ टेक ॥
मादा बनी सारकी सूली, नारी नरकका कूआ रे ॥१॥ हाड़ चाम का बना पींजरा, तामें मनुखों सूआ रे ॥२॥ भाई बन्धु और कुटुम्ब वनेरा, तिनमें पच २ मूआ रे ॥३॥ कहत कबीर सुनो भाई साधो, हार चला जग जूआ रे ॥४॥
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भजन ( राग काफी ) ।
नर समझत नाहिं अनारी ॥ टेर ॥ गर्भवसमें उलटो लटक्यो, पायो दुःख अति भारी । जोगसु ! अबके मैं बाहर निकसों, तेरो भजन कहूँ हरबारी ।
पलक नाहिं देउँ बिसारी ॥ १ ॥ जन्म होत माया लिपटायो, भूल गया सुध सारी । भक्ति भावमें चित ना राख्यो, ऐसी कुमत्त बिचारी ।
जन्मकी कर दई ख्वारी ॥ २ ॥ आया था कुछ लाभ करनेको, गँठकी पूँजी हारी । सौदा कर ले राम नामका, आओ शरण गिरधारी ।
भरोसा जिनका है भारी ॥ ३ ॥ श्री सतगुरु तोहि नित समझावें, वे हैं सबके हितकारी । आप तैं औरनको ताँरें, कहै “हरिदास” पुकारी । उम्र योही सुफ्त गुज़ारी ॥४॥
गुज़ल ।
उठ जागरे मुसाफ़िर ! किस नींद सो रहा है ? । जीवन अमूल्य प्यारे, क्यों सुफ्त खो रहा है ? ॥१॥ रहना न यहाँ पे हेगा, दुनियाँ सराय फ़ानी । किसकर नदीमें प्यारे, क्यों मस्त हो रहा है ? ॥२॥
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ले ले धरमका तोषा, मत भूल ऐ दिवाने ! । नेकी की खेती करले, क्यों पाप बो' रहा है ? ॥३॥ माता पिता वा भाई, होंगे न केई साथी । क्यों मोहरूपी बोम्मा, नाहक केा टो रहा है ? ॥४॥ किरती तेरी पुरानी, हिकमतसे पार करले । ऐ दिल ! अथाह जलमें, तू क्यों डुबो रहा है ? ॥५॥
भजन ( लावनी )
पड़ लोभ मोहके जालमें, नर आयू क्यों खोता है ॥ टेक ॥ यह जग जान रैनका सुपना, जिसकेा कहता अपना-अपना । भूल गया ईश्वरका जपना, फँसा हुआ धन-मालमें । क्या सुखकी नींद सोता है ? ॥ १ ॥
चले अकड़ बन छैल छबीला, अन्त समय सब हा जाय टीला । काम न आये कुटुम्ब-कबीला, भूला जिनके ख्यालमें ।
केई साथी नहीं होता है ॥ २ ॥
अब क्यों सिर धुनि-धुनि पछितावे, रदन करै और रौल मचावे । कुछ नहीं तेरी पार बसावे, चूका पहिली चालमें ।
क्या खड़ा-खड़ा रोता है ? ॥ ३ ॥
समझ सोच कर कदम उठाना, मुश्किल मनुषजनम है पाना । कहै "सुरारी" जो हो दाना, भ्रज हर को हर हाल में ।
क्यों पाप-बीज बोता है ? ॥ ४ ॥
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महात्मा सुन्दरदासजी की भी सुविधे :—
बैरी घर भँहि तेरे, जानत सनेही मेरे । दारा सुत विच तेरे, खोंसि-खोंसि खायँगे । औरहु कुटुम्बी लोग, लूटें चहुँ धोएही ते । मीठी मीठी बात कहि, तोसैं लपटायँगे । संकट परेगो जब, कोई नहीं तेरो तब । धन्तही कठिन, बाकी बेर उठि जायँगे । “सुन्दर” कहत, तातें झूठो ही प्रपञ्च सब । स्वपनकी नाई, यह देखत विलायँगे ॥१॥
घरी-घरी घटत, छीजत जात छिन-छिन । भीजतही गरिजात, माटीको सो ढेल है । सुकृतिके द्वार आई, सावधान कयँ न होइ । बेर-बेर चढ़त न, तियाको सो तेल है । करि ले सुकृत, हरि भज ले अखण्ड नर । याहीमें धन्तर पड़े, यामें ब्रह्म मेल है । मनुष्य-जनम यह, जीत भावै हार अब । “सुन्दर” कहत यामें जूझाको सो खेज है ॥२॥
जिनको तू अपने सनेही-मित्र और खो-पुत्र, माता-पिता भाई-बहन आदि सम्प्रभुता है, वे तेरे घरमें तेरे ही दुश्मन हैं । वास्तवमें, वे सब तेरे शत्रु हैं ; पर मोहके कारण तुझे वे मित्र
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से मालूम होते हैं। स्त्री-पुत्र आदि तेरा धन तुझसे छीन-छीन कर खॉयेंगे। और कुटुम्बी लोग भी तुझे चारों ओर से लूटेंगे और मोठी-मोठी बातें बनाकर तेरे लिपटेंगे। तेरे लिये वे धन-दौलत, जीव-जान और सर्वस्व तक खाहा कर देनेको ढीगें मारेंगे, लेकिन जब तुझ पर संकट पड़ेगा, काल तुझ पर आक्रमण करेगा, तब तेरा कोई न होगा। अन्तकाल ही कठिन है और उस समय सब तुझे छोड़-छोड़ कर दूर हो जायेंगे। “सुन्दरदास” कहते हैं, इसलिये यह सब प्रपञ्च भूठा है; कोई किसीका साथी नहीं है। मरने पर सब स्वप्नकी माया की तरह बिलाय जायेंगे।
घड़ी-घड़ी उग्र धटती है और क्षण-क्षण काया छीजती है। जिस तरह मिट्टीका ढेला भीजते ही गल जाता है; उसी तरह यह काया गल जाती है। अरे मूढ़! मुक्तिके द्वार पर आकर, होशियार क्यों नहीं होता? मनुष्य-चोला पाकर, आवागमनसे पीछा क्यों नहीं छुड़ाता? यह चोला तुझे उसी तरह बारम्बार नहीं मिलेगा; जिस तरह त्रियाका तेल बार-बार नहीं चढ़ता। तू पुण्य करले और अखण्ड अविनाशी ब्रह्मको भजले। इसमें अन्तर पड़नेसे अन्तर पड़ता है और इसमें लग जानेसे जीव ब्रह्ममें मिल जाता है। इस मनुष्य-जन्मका मिलना जूएका सा खेल है। अब चाहे जीत या हार; बाज़ी मार ले और चाहे खो दे।
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दोहा ।
रोग वियोग विपत्ति बहु, देह आयु आधीन ।
निडर विधाता जग रच्यो, महा अथिरता लीन ॥१०५॥
105. People's health is destroyed by hundreds of mental and physical diseases. Wherever there is wealth misfortunes come in like thieves, breaking open the doors of houses. He who is born, soon falls helplessly into the jaws of death from which there is no escape. Then what is there in this world which is made by the wilful Brahma to last for ever ?
कृच्छ्रेणामेव्यमध्यं नियमिततदुभिः स्थायते गर्भमध्ये कान्ता- विरलेषुः स्वव्यतिकर विषमे यौवने विप्रयोगः ॥ नारीणां मय- वज्ञा विलसति नियतं वृद्धभावोऽप्यसाधुः संसारे रे मनुष्या वदत यदि सुखं स्वल्पमप्यस्ति किंचित् ॥१०६॥
प्रथमावस्थामें प्राणी माताके गर्भमें पड़ा रहता है। वहाँ वह, मलमूत्र राख लोहू प्रशुति गन्दी चीज़ोंके बीचमें पड़ा हुआ, बड़े-बड़े कष्ट भोगता और हिल भी नहीं सकता। दूसरी अवस्था—जवानोंमें, वह अपनी प्यारी स्त्रीकी जुदाईके दुःख सहन करता है। तीसरी अवस्था—बुढ़ापेमें, वह झिंयोंसे अनाहत होकर दुःख में पड़ा रहता है। हे मनुष्यो ! इस संसारमें जरासा भी सुखे हो तो हमें बताओ ॥१०६॥
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गर्भावस्था।
माताके छून और पिताके वीर्यासे, गर्भाशयमें, प्राणीकी देह बनती है। चार मास बाद, उस देहमें जीव आ जाता है। उस समय वह और अन्धकारपूर्ण क्रेदखानेमें हाथ-पाँव-बन्धा हुआ उल्टा लटकता रहता है। मुँह पर फिल्ली होनेके कारण, न बोल सकता है और न रो सकता है। जिस स्थानमें वह नौ मास तक रहता है, वह स्थान—गर्भाशय—मल, मूत्र, राघ, छून, पीव और कफ प्रभृति महागन्धे पदार्थोंसे भरा रहता है। वह जगह गन्दी होनेके सिवा, इतनी तङ्ग भी है कि, वहाँ वह अच्छी तरह फैल-पसर भी नहीं सकता। उसी मैली और तङ्ग जगहमें, जो साक्षात् नरक है, वह बड़े ही कष्टसे नौ महीने काटता है। नरक-कुण्डके कष्टोंसे दुःखी होकर, वह परपातमाको याद करता और उससे वादा करता है कि, इस बार मैं जन्म लूँगा, तो, और कुछ न करके, केवल आपकी उपासना ही करूँगा। खैर, भगवान् दयाकर उसे बाहर निकालते हैं; पर बाहर आतेही वह, माया-मोहमें फँसकर, ईश्वरको भूल जाता है।
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बालावस्था ।
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बालावस्था भी परम दुःखकी मूल है। इस अवस्थामें प्राणी पराधीन और अतीव दीन रहता है। अशक्तता, मूर्खता, इच्छा, वपलता, दीनता और दुःख-सन्ताप,—ये विकार इस अवस्थामें आ जाते हैं। बालक एक पदार्थ की ओर दौड़ता, दूसरेको पकड़ता और तीसरेकी इच्छा करता है। वह बड़ी-बड़ी इच्छायें करता है, पर उसकी इच्छायें पूरी नहीं होती। वह सदा तृष्णाके फेरमें पड़ा रहता और क्षण-क्षणमें भयभीत होता है। उसे कभी शान्ति प्राप्त नहीं होती। जिस तरह कंदलीबनका हाथी, सड़लोंमें बँधा हुआ, दीन हो जाता है ; उसी तरह यह चैतन्य पुरुष, बालावस्था रूपी सड़लोंमें, महादीन हो जाता है। जिस तरह क्षण-क्षणमें द्वारकी और दौड़ने वाले कुत्तेका अपमान होता है ; उसी तरह बालकका अनावर होता है। उसे सदा माता-पिता और बान्धवोंका भय रहता है। यहाँ तक कि, अपनेसे बड़े बालकों और पशु-पक्षियोंसे भी उसे भीत रहना पड़ता है। स्त्रीके नयन और नदीके प्रवाहसे भी बोलक और मनकी चञ्चलता अधिक है। सच तो यह है कि, बालक और मनकी चञ्चलता समान है ; और सबको चञ्चलता इन दोनोंकी चञ्चलताके नीचे है। जिस तरह वेश्याका मन एक पुरुषमें नहीं उहरता, उसी तरह बालकका मन भी एक पदार्थमें नहीं उहरता।
इस काम या पदार्थसे मेरा अनिष्ट-होगा या कल्याण,
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इतना भी ज्ञान बालकको नहीं होता। जिस तरह ज्येष्ठ आषाढ़में पृथ्वी तपती रहती है ; उसी तरह सुख-दुःख और इच्छा प्रभृतिके शोषासे बालक जलता रहता है।
बालकमें अशक्तता और पराधीनता इतनी होती है कि, वह आप न उठ सकता है, न बैठ सकता है, न चल सकता है और न खा सकता है। कोई उठा लेता है, तो गोदमें आ जाता है ; नहीं तो अपने मल-मूत्रमें ही पड़ा-पड़ा रोया करता है। कोई दूध पिठा देता है, तो पी लेता है ; नहीं तो रोता रहता है। यह शिशु अवस्था है। इस अवस्थाको पार कर वह बालकावस्थामें आता है ; तब लिखने-पढ़नेका भार उसके सिर पर आता है। उस समय बालक गुरुसे इस तरह डरता है ; जिस तरह कोई यमदूतसे डरता है। ज़रा भी दृढ़ता करने या न पढ़नेसे माता-पिता और गुरु प्रभृतिकी ताड़नायें सहनी पड़ती हैं। अगर उसे कुछ रोग हो जाता है, तो वह साफ-साफ कह नहीं सकता और उसे सह भी नहीं सकता ; भीतर-ही-भीतर जलता और दुःख पाता है। यह अवस्था महामूर्खतापूर्ण है। बालक कभी कहता है कि, मुझे बर्फका टुकड़ा भून दो ; कभी कहता है कि, आकाशका चाँद उतार दो। भोला इतना होता है कि, थालीमें जल भरकर चाँद दिखाने और दूधकी जगह आटा घोळ कर दे-देनेसे भी राजी हो जाता है। इस अवस्थामें दुःख-ही-दुःख है; सुख और स्वाधीनता का नाम भा नहीं। परमात्मा यह अवस्था किसीको न दे।
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युवावस्था।
बालावस्थाके बाद युवावस्था आती है। यद्यपि यह अवस्था नौबेसे ऊपर बढ़ती है ; पर यह और भी बुरी है। १५१६ सालकी अवस्थामें शादी कर दी जाती है। इसे 'शादी खाने आबादी' कहते हैं, पर यह है वर्वादी। बेचारेके पैरोंमें पेसी बेड़ियाँ डाल दी जाती है, कि उसे जन्म-भर आज्ञादी नहीं मिलती। लोहे और काठकी बेड़ियोंसे चाहे मनुष्यको छुट-कारा मिल जाय ; पर स्त्रीरूपी बेड़ियोंसे जीवन-भर छुटकारा नहीं मिलता। अब तक पढ़ने लिखनेकी चिन्ता और गुरु प्रभृतिके भयसे ही दुखी रहना पड़ता था ; पर अब और फिक —चिन्तायेँ सिर पर सवार होती हैं। वही माता-पिता, जिन्होंने शादी-शादी कहकर पैरोंमें स्त्रीरूपी बेड़ियाँ पहना दी थीं, उठती जवानीके पट्टेको भून-भूनकर खाते हैं। कहते हैं,—“हमने तुझे पढ़ा-लिखा दिया, तेरा शादी-व्याह कर दिया ; हमारा कर्तव्य पूरा हुआ ; अब तू क्या। अगर नहीं कमाता है, तो अपनी स्त्री को ठेकर अलग हो जा।” इस समय बेचारे की जान पर बन आती है। नौकरी या रोज़गारका मिलना कोई खेल नहीं ; इसलिये बेचारा भीतर-ही-भीतर जल-जलकर खाक होने लगता है। अगर धनी घर में जन्म होता है, तो ये कष्ट भोगने नहीं पड़ते। उस
( ३८४ )
अवस्थामें और ही नाशके समान आ इकट्ठे होते हैं। धन, यौवन और प्रभुता इनमेंसे प्रत्येक अनर्थकी जड़ है। जहाँ ये सब इकट्ठे हो जाये, वहाँका तो कहना ही क्या ? जिस तरह धन पानेकी आशासे, निर्धन लोग धनीको घेर रहते हैं ; उसी तरह, इस अवस्थामें, सब दोष आकर युवकको घेर लेते हैं। गुंवावस्था रुपी रात्रिको देखकर काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार “आत्मज्ञान-रुपी धनको” लूटते हैं ; इसलिये बिस्त्र शान्त नहीं रहता और विषयोंकी ओर दौड़ता है। विषयोंको संयोग होनेसे तृष्णा बढ़ती है। इस तृष्णा-राक्षसीके मारे प्राणी जन्म-जन्मान्तरमें दुःख भोगता है।
इस अवस्थामें विषय-भोगोंकी ओर मन त्रिषादाँ रहता है। स्त्री अत्यधिक प्यारी लगती है। नितनयी स्त्रियों पर मन चला करता है। अगर कोई मित्र आता है, तो नवयुवक उससे कहता है,—“अरे यार ! वह नाज़नी कैसी खूबसूरत है ! उसने तो मेरा दिलहो ले लिया। उसके दीवार बिना मुझे क्षण-भर भी चैन नहीं। वह कैसे मिले ?” बस ; ऐसीही बातें अच्छी लगती हैं। अगर इच्छित स्त्री नहीं मिलती, तो मनमें क्रोध होता है ; क्रोधसे मोह होता है और मोहसे बुद्धि नष्ट हो जाती है। बुद्धिके नष्ट होनेसे, मनुष्य बिना पतवारकी नावकी तरह नष्ट हो जाता है। समुद्रमें अगाध जल भरा है। उसमें अनन्त तूफ़ानें उठती हैं। इतना विशाल महासागर, ईश्वर-आज्ञाके विरुद्ध, मर्यादाको नहीं मेटता ; पर
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युवावस्था शास्त्र और ईश्वर दोनोंको आज्ञाओंको भेट देती है। जिस तरह अँधेरेमें पदार्थोंका ज्ञान नहीं रहता ; उसी तरह युवावस्थामें शुभ-अशुभ या भले-बुरेका ज्ञान नहीं रहता। जवानी दीवानोंमें लोक-लाज और हया-शर्म सब हवा हो जाती हैं।
लिख चुके हैं, युवा अवस्थामें स्त्री सबसे अधिक प्यारी लगती है। अगर किसी तरह छोसे वियोग हो जाता है, तो उसकी वियोगाश्रिमें पुरुष इस तरह जलता है, जिस तरह दावाश्रिसे वनके वृक्ष जलते हैं। युवावस्थामें बड़े-से-बड़े बुद्धिमानोंकी बुद्धि उसी तरह मलिन हो जाती है ; जिस तरह वर्षाकालमें निर्मल नदी मलिन हो जाती है। इस अवस्थामें “वैराग्य और सन्तोष प्रभृति” गुणोंका अभाव हो जाता है।
मर्यादा-पुरुषोत्तम रामचन्द्रजीने महामुनि वशिष्ठजीसे कहा है—“हे मुनिवर ! जिस महासागरमें अनन्त और अगाध जलराशि है तथा लाखों करोड़ों बड़े-बड़े मगर, मच्छ और बड़ियाल हैं, उसका पार करना महा कठिन है ; पर मैं उसका पार करना उतना मुश्किल नहीं समझता, जितना कि मैं इस युवावस्थाका पार करना कठिन समझता हूँ। युवावस्था विषयोंकी ओर ले जाने वाली, महा अनर्थकारी और लोक-परलोक नशाने वाली है। जिस तरह आकाशमें बनका होना आश्चर्य्यकी बात है ; उसी तरह युवावस्थामें सब सुखोंके मूल “वैराग्य, विचार, सन्तोष और शान्ति” का होना आश्चर्य्य है।”
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