वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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बचपन आपने खेल-कूदमें और जवानी लीके साथ पेश-आराम में बिता दी !! क्या आपको ऐसा ही करना चाहिये था ?
यह मंत्रुष्य-बोला इसलिये मिला है, कि मनुष्य । इस जगत्में दूसरों पाणियोंकी शुभचिन्तना करे और अपने कर्म-बन्धन काट कर परमपदकी प्राप्ति करे ; पर लोग तो इसको चमक-दमक कर ऐसे भूल जाते हैं, कि उन्हें अपनी आगेकी सफ़रका खयाल ही नहीं रहता । ऐसा समझने लगते हैं, मानो वह सदा यहीं रहेंगे । यहाँके लिप, जहाँ उन्हें बहुत ही थोड़े दिन रहना होता है, इतारों तरहके सामान करते हैं ; पर आगेकी लम्बी सफ़र के लिये कुछ भी नहीं करते ! यहाँके लिये इतना आड़म्बर और वहाँके लिये कुछ नहीं । यह चतुराई तो अच्छी नहीं मालूम होती । उस्ताद जौक ने कहा है :—
क्या यह दुनियाँ, जिसमें कोशिश हो न दीं के वास्ते ।
वास्ते वों के बी कुछ—या सब यहीं के वास्ते ॥
इस दुनियामें आकर कुछ परलोकके लिये भी करना चाहिये । यह नहीं, कि उधरकी फिक बिल्कुल ही न की जाय ।
हमें सृष्टिके प्रत्येक पदार्थ और नेचरके प्रत्येक कामसे परोपकारकी शिक्षा मिलती है । सूर्य परोपकारके लिये ही आकाशमें प्रमण करता है । चन्द्रमा परोपकारके लिये ही कष्ट सहकर जगत्में शीतल चाँदनी छिड़काता है । सितारे
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