वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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अँधेरी रातमें मुसाफिरोंको राह दिखानेके लिये ही रात-भर टिमटिमाते हैं। ध्रुव उत्तर दिशाका ज्ञान कराने और समुद्र के अगाध और अनन्त जलमें जहाजोंको राह दिखानेके लिये ही चमकता है। नदियाँ परोपकारके लिये ही बहती हैं। वृक्ष परोपकारके लिये ही फलते हैं। परोपकारके लिये ही, शेषजीने इस लम्बी-चौड़ी पृथिवीका भार अपने सहस्र फणों पर धारण कर रखा है। कच्छपने, परोपकारके लिये ही शेष समेत पृथ्वीका भार अपनी पीठ पर वहन कर रक्खा है। भगवान्ने परोपकारके लिये ही बारम्बार अवतार लेकर जन्म-मरणका कष्ट उठाया है। शिवि और दक्षोचिने परोपकारके लिये ही अपनी जानें दे दीं। किसी कविने कहा है :—
विरक्षा फलै न आप को, नदी न अचवे नीर । परोपकार के कारणे, सन्तन धरो शरीर ॥ शेष शीश धारे धरा, कहु न अपनो काज । परहित पर सारथी रथी, वाङ्क बने न लाज ॥
किसी जड़ुठमें चूहोंकी एक कृतार चली जाती थी। उनमें एक चूहा अन्ध था। उसके मुखमें एक तिनका पकड़कर, दूसरे चूहेने उसे अपने मुँहमें पकड़ रक्खा था। उसके सहारे अन्ध चूहा भी चला जाता था। यह जानवरोंका हाल है। पशुओंमें भी परोपकार-बुद्धि होती है। जो मनुष्य होकर परोप-