भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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कार शून्य है, वह पशुओंसे भी गया-बीता है। खासकर मनुष्य- देह तो परोपकारके लिये ही दी गयी है ; अतः मनुष्यको परोप- कार करना ही चाहिये। कहा है :—

परोपकारः कर्तव्यः श्रायौरपि धनैरपि ।

परोपकारंजं पुरयं न स्यात् ऋतुशतैरपि ॥

परोपकारशून्यस्य धिड्मनुष्यस्य जीवितम् ।

यावन्तः पशवस्तेषां चर्माप्युपकरिष्यति ॥

आत्मार्यं जीवलोकेऽस्मिन् को न जीवति मानवः ।

परं परोपकारार्थं यो जीवति स जीवति ॥

धन और प्राणोंसे परोपकार करना चाहिए ; क्योंकि परोप- कारके पुण्यके बराबर सौ यज्ञोंका भी पुण्य नहीं है।

परोपकार-शून्य मनुष्योंके जानेको भी धिक्कार है ! पशुओं- का चमड़ा भी पराये काम आता है।

अपने लिये इस लोकमें कौन नहीं जीता ? पराये लिये जो जीता है वही जीता है और तो मृतकवत् है।

सौ यज्ञोंका पुण्य भी परोपकार-जन्य पुण्यकी

बराबरी नहीं कर सकता।

एक वैश्यने अपने करोड़ों रुपये यज्ञोंमें खर्च कर दिये। शेषमें वह निर्धन हो गया। उसकी स्त्रीने उसे सलाह दी