भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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कि, तुम राजाको अपने दो चार यज्ञोंका फल देकर धन ले आओ, तो शेष जीवन सुखसे कट जाय। वैश्य राजी हो गया। सेठानीने उसे राहमें खानेके लिए नौ रोटियाँ रख दीं। वह वनमें पहुँच कर एक वृक्षके नीचे ठहर गया। वहाँ पानी जोरसे बरसनेके मारे राह न थी। उसी पेड़के खोंठरमें एक कुतिया व्यायी थी। वह वर्षाके मारे नौ दिनसे खूराककी तलाशमें कहीं जा न सकी थी; इसलिये भूखी मरणासन्न हो रही थी। वैश्यने उसे अपनी सब रोटियाँ खिलादीं और आप भूखा रह गया। वह भूखा-प्यासा राजाके पास पहुँचा और उसे अपनी राम-कहानी कह सुनाई। राजाने राज-ज्योतिषीसे पूछा—“इस सेठके कौनसे यज्ञका फल उत्तम है?” ज्योतिषीने कहा—“महाराज! इसने राहमें कुतियाको अपनी रोटियाँ खिलाकर जो उपकार किया है, उसीका फल उत्तम है; आप उसे ही खरीद लीजिये।” वैश्य उस परोपकारके पुण्य-फलको देने पर राजी न हुआ; तब राजाने उसे कई लक्ष सुद्रा देकर विदा किया। सारांश यह, कि संसारमें परोपकार और दयाके समान और पुण्य नहीं है। अतः मनुष्यको निःस्वार्थ भावसे परोपकार करना चाहिये। जो मनुष्य होकर परोपकार नहीं करता, उसका जन्म वृथा है।

‘किसीने कहा है :—

‘जातः कर्मः स एकः पृथुयुवनभरायापितं येन पृष्टं शलायं जन्म ध्रुवस्व प्रमति नियमितं यत्र तेजस्विक्वम् ॥’

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