भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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संजातव्यर्थपन्नाः परहितकरणे नोपरिष्टात्र चाधो ब्रह्मरहोडुम्भरान्तर्मशकवदपरे प्राणिनोजातनष्टाः ।

संसारमें उस प्रसिद्धः कलुषका जन्म ही सफल है, जिसने इस विशाल पृथ्वीका भार उठानेके लिये अपनी पीठ दे रखी है ; और इसी तरह ध्रुवका जन्म प्रशंसनीय है, जिसको बीच में लेकर सप्तश्रषियोंका ज्योति-मण्डल घूमता है । परोपकार करनेमें अशक्य मनुष्योंका जन्म इस ब्रह्माण्डमें गूठके बीचमें रहने वाले उन मच्छरोंके समान वृथा है, जो पंख सहित होनेपर भी कुछ नहीं कर सकते ।

अतः भाइयो ! स्त्री-पुत्र प्रभृतिके लिए अमूल्य जीवन वृथा नाश मत करो । ये आपके कोई नहीं । ये यहीं के साथी और बड़े स्वार्थी हैं ; परलोकमें आपके साथ न जायेंगे ; वहाँ केवल धर्म ही आपके साथ जायगा । मौत आपके लेजानेके लिए आना ही चाहती है । इसलिये चेत करो, आँखें खोलो, अब न सोओ । साँस-साँस पर जगदीशका सुमिरन करो और निष्काम भावले प्राणियों पर दया और परोपकार करो ; क्योंकि मरने पर ये ही आपके काम आयेगे ।

कविता या गानेको चीज़ोंका प्रभाव मनुष्य पर बड़ी जल्दी पड़ता है ; इसीसे हम चार-पाँच चिन्ताकर्षक और मोह-भञ्जन करनेवाले गाने नीचे देते हैं :—