भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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अवस्थामें और ही नाशके समान आ इकट्ठे होते हैं। धन, यौवन और प्रभुता इनमेंसे प्रत्येक अनर्थकी जड़ है। जहाँ ये सब इकट्ठे हो जाये, वहाँका तो कहना ही क्या ? जिस तरह धन पानेकी आशासे, निर्धन लोग धनीको घेर रहते हैं ; उसी तरह, इस अवस्थामें, सब दोष आकर युवकको घेर लेते हैं। गुंवावस्था रुपी रात्रिको देखकर काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार “आत्मज्ञान-रुपी धनको” लूटते हैं ; इसलिये बिस्त्र शान्त नहीं रहता और विषयोंकी ओर दौड़ता है। विषयोंको संयोग होनेसे तृष्णा बढ़ती है। इस तृष्णा-राक्षसीके मारे प्राणी जन्म-जन्मान्तरमें दुःख भोगता है।

इस अवस्थामें विषय-भोगोंकी ओर मन त्रिषादाँ रहता है। स्त्री अत्यधिक प्यारी लगती है। नितनयी स्त्रियों पर मन चला करता है। अगर कोई मित्र आता है, तो नवयुवक उससे कहता है,—“अरे यार ! वह नाज़नी कैसी खूबसूरत है ! उसने तो मेरा दिलहो ले लिया। उसके दीवार बिना मुझे क्षण-भर भी चैन नहीं। वह कैसे मिले ?” बस ; ऐसीही बातें अच्छी लगती हैं। अगर इच्छित स्त्री नहीं मिलती, तो मनमें क्रोध होता है ; क्रोधसे मोह होता है और मोहसे बुद्धि नष्ट हो जाती है। बुद्धिके नष्ट होनेसे, मनुष्य बिना पतवारकी नावकी तरह नष्ट हो जाता है। समुद्रमें अगाध जल भरा है। उसमें अनन्त तूफ़ानें उठती हैं। इतना विशाल महासागर, ईश्वर-आज्ञाके विरुद्ध, मर्यादाको नहीं मेटता ; पर