वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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युवावस्था शास्त्र और ईश्वर दोनोंको आज्ञाओंको भेट देती है। जिस तरह अँधेरेमें पदार्थोंका ज्ञान नहीं रहता ; उसी तरह युवावस्थामें शुभ-अशुभ या भले-बुरेका ज्ञान नहीं रहता। जवानी दीवानोंमें लोक-लाज और हया-शर्म सब हवा हो जाती हैं।
लिख चुके हैं, युवा अवस्थामें स्त्री सबसे अधिक प्यारी लगती है। अगर किसी तरह छोसे वियोग हो जाता है, तो उसकी वियोगाश्रिमें पुरुष इस तरह जलता है, जिस तरह दावाश्रिसे वनके वृक्ष जलते हैं। युवावस्थामें बड़े-से-बड़े बुद्धिमानोंकी बुद्धि उसी तरह मलिन हो जाती है ; जिस तरह वर्षाकालमें निर्मल नदी मलिन हो जाती है। इस अवस्थामें “वैराग्य और सन्तोष प्रभृति” गुणोंका अभाव हो जाता है।
मर्यादा-पुरुषोत्तम रामचन्द्रजीने महामुनि वशिष्ठजीसे कहा है—“हे मुनिवर ! जिस महासागरमें अनन्त और अगाध जलराशि है तथा लाखों करोड़ों बड़े-बड़े मगर, मच्छ और बड़ियाल हैं, उसका पार करना महा कठिन है ; पर मैं उसका पार करना उतना मुश्किल नहीं समझता, जितना कि मैं इस युवावस्थाका पार करना कठिन समझता हूँ। युवावस्था विषयोंकी ओर ले जाने वाली, महा अनर्थकारी और लोक-परलोक नशाने वाली है। जिस तरह आकाशमें बनका होना आश्चर्य्यकी बात है ; उसी तरह युवावस्थामें सब सुखोंके मूल “वैराग्य, विचार, सन्तोष और शान्ति” का होना आश्चर्य्य है।”
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