भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ३८६ )

महाराजा रामचन्द्र एक और जगह कहते हैं :—“गुवावस्था ! सुक्र पर दया करके तु न आना ! मुझे तेरी ज़रूरत नहीं, क्योंकि मेरी समझमें तेरा आना दुःखांका कारण है। जिस तरह पुत्रके मरनेका सङ्कट पिताके सुखके लिए नहीं होता ; उसो तरह तेरा आना भी सुखके लिए नहीं होता।”

वृद्धावस्था ।

यह अवस्था पहली दो अवस्थाओंसे भी बुरी है। बाल्यावस्था महा जड़ और अशक्त है ; गुवावस्था अनर्थ और पापों को मूल है तथा वृद्धावस्थामें शरीर जज्जर और बुद्धि क्षीण हो जाती है, कृब निकल आता है, दांत गिर पड़ते हैं, बाल सफेद हो जाते हैं, बल कम हो जाता है, आँखोंसे कम सूक्ष्मता या सूक्ष्मता ही नहीं, कानोंसे सुनाई नहीं देता, पैरोंसे चला नहीं जाता, लकड़ी टेक-टेक कर चलना होता है, कफ और खाँसी अपना दौर-दौरा जमा लेते हैं, हर समय साँस फूलने लगता है। बहुत क्या—स्वारे रोग, शत्रुओंकी तरह मौका पार्कर, इस अवस्थामें चढ़ाई कर देते हैं। खी-पुत्रादिक सभी नाते-रिश्तेदार बूढ़ेको उसो तरह त्याग देते हैं ; जिस तरह पके फलको वृक्ष और निकम्मे बूढ़े बैलको बैलवाला त्याग देता है।