भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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जरा अवस्था या बुढ़ापा मृत्युका पेशासीमा या लेनडोरी है। जिस तरह साँझ होनेसे रात निकट आती है ; उसी तरह बुढ़ापेके आनेसे मौत नज़दीक आती है। सन्ध्याके आने पर जो दिन की इच्छा करते हैं और बुढ़ापेके आने पर जो जीने की अभिलाषा रखते हैं, वे दोनों ही मूर्ख हैं। जिस तरह बिलली बूहेके खा जानेकी घातमें रहती है और चाहती है कि, बूहा आवे तो खा जाऊँ ; उसी तरह मौत देखती रहती है कि, बुढ़ापा आवे तो मैं इसे ग्रहण करूँ। ऐसा जान पड़ता है, मानो बुद्धावस्था कालकी सखी है। वह आकर योगरूपी आगसे शरीरके मांसको जलाती या पकाती है और उसका स्वामी—काल आकर प्राणीको भक्षण कर जाता है। अशक्ता, अङ्गपीड़ा और खाँसी,—ये तीनों कालकी पर-रानियाँ हैं। जिस तरह बनमें वाघिन आकर पहले शब्द करती या गरजती और मृगका नाश करती है ; उसी तरह शरीर-रूपी बनमें खाँसी-रूपी वाघिन आकर बल-रूपी मृगका नाश करती है। जिस तरह चन्द्रमाके उदय होनेसे कमलिनो खिल उठती है ; उसी तरह बुढ़ापेके आनेसे मृत्यु प्रसन्न होती है। जरा बड़ी ज्वर्दस्त है। इसने बड़े-बड़े शत्रुहन्ताओंके मान मर्दन कर दिये हैं। यह शरीरको आगकी तरह जलाती है। जिस तरह वृक्षमें आग लगती है, तब धूआँ निकलता है ; उसी तरह शरीर-वृक्षमें जरा-रूपी अश्विके लगनेसे तृष्णा रूपी धूआँ निकलता है। जरा-रूपी ज्वांरोंमें बँधनेसे मनुष्य दीन