वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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हो जाता है, अङ्ग शिथिल हो जाते हैं, बल क्षीण हो जाता है, इन्द्रियां निर्बल हो जाती हैं और शरीर जर्जर हो जाता है ; पर तुष्णा उठटी बलवती हो जाती है। इस अवस्थामें घोर दुःख है ; सुखका तो लेश भी नहीं।
जिस समय पुण्य बूढ़ा हो जाता है, उसमें क्रमानेकी शक्ति नहीं रहती ; तब सभी उसे पागल समझ कर, उसकी हँसी करते और उसके पुत्र-पौत्रादिक उसे गुरी नज़रसे देखते हैं। यहाँ तक कि, खास उसकी अर्द्धाङ्गी उससे घृणा करने लगती है। पुत्र उसे कोई चीज़ नहीं समझते। और लोग भी उसे वृथाकी बला समझते हैं। पुत्र और पुत्रबधुए उसे एक रूटी सी खाट पर पौलीमें डाल देते हैं और उसके थूकने को एक ठिकरा रख देते हैं। आप समय पर अच्छे-से-अच्छा खाना खाते हैं ; पर उसे, समय-बे-समय, जब याद आ जाती है, बचा-खुवा वासी-कूसी खाना एक पुरानी और फूटीसी थाली या ठीकरेमें रख कर दे आते हैं। जब उसका थूक-खबार या मछ-मूत्र उठाते हैं, तब उसे सैकड़ों तरहकी न कहने योग्य बातें सुनाते हैं,—“अब मर क्यों नहीं जाते ? जवान-जवान मरे जाते हैं, पर तुमको मौत नहीं आती !” प्रभृति। यह दुर्गति बुढ़ापेमें होता है।
अगर घर-गृहस्थीमें सौभाग्यसे कोई दुःख नहीं होता, घरवाले स्त्री-पुत्र आदि अच्छे मिल जाते हैं, घरमें परमात्माकी दयासे सुखेश्वर्यके सभी सामान मौजूद होते हैं ; तो दूसरोंका