वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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भला न चीतने वाले, दूसरोंको अच्छी अवस्थामें देखकर कुदने वाले ही तड़क करते हैं। वह अपनी ओरसे उसका सर्वनाश करनेमें कोई बात उठा नहीं रखते। यद्यपि ऐसी बातोंसे उन्हें कोई लाभ नहीं होता; तोभी वे बिल्हों की सी करतूतोंसे बाज़ नहीं आते; हृदय नाकमें दम किये रहते हैं। मतलब यह कि, संसारमें दुःखोंकी ही अधिकता है। यहाँ सुख है ही नहीं। अगर है, तो बराय नाम और उससे परिणाममें कोई लाभ नहीं; बरन हानि है। उस्ताद ज़ौक कहते हैं :—
राहतो रंज ज़मानेमें हैं दोनों, लेकिन ।
यों अगर एक को राहत है, तो है चारको रंज ॥
निरस्तन्देह संसारमें सुख और दुःख दोनों ही हैं—पर बहुलता दुःख ही की है, क्योंकि चार दुःखियोंमें मुश्किलसे एक सुखी मिलता है।
उस्ताद ज़ौक ही एक जगह और कहते हैं :—
हलावते शरमो पासदारी, जहाँमें है जौक रजोख्वारी ।
मजेसे गुज़री, अगर गुज़ारी किसीने वे नामोंनंग होकर ॥
संसारसे दूर रहना अच्छा; यहाँके सम्बन्धोंकी जड़ेंमें दुःख और बलेश भरा हुआ है। जिसने अपनी जिन्दगी खुप-चाप गुज़ार दी; सच तो यह है, उसने अच्छी गुज़ार दी।
सारंग यह, कि सभी महात्माओंने संसारके दुःखोंका