भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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अनुभव करके औरोंको चेतावनी दी है, कि इस मिथ्या जगत् की मायामें न भूलो ; इससे दिल मत लगाओ, किन्तु इसके बनानेवालेके साथ दिल लगाओ । इसके साथ दिल लगानेसे तुम्हारा बुरा और उसके साथ दिल लगानेसे भला है ।

गोस्वामी तुलसीदासजीने कहा है :—

सलिल युक्त शोषित समुक्त, पल श्रु अस्थि समेत । बाल कुमार युवा जरा, है सु समुक्त कर चेत ॥ ऐसेहि गति अवसान की, तुलसी जानत हेत । ताते यह गति जानि जिय, अविरल हरि चित चेत ॥

स्त्रीकी रज और पुरुषके वीर्यसे तुम्हारे शरीरके सूत, मांस और हड्डियाँ बनीं । फिर तुम गर्भाशयसे बाहर आये । फिर बालक अवस्थामें रहे ; उसके बाद युवावस्था आई ; फिर बुढ़ापा आया । फिर तुम मरे और कर्मफल भोगनेको फिर जन्म लिया । इस तरह लोक-वासनाके कारण तुम्हें बारम्बार जन्मना और मरना पड़ता है । इसमें कैसे-कैसे कष्ट उठाने पड़ते हैं, इन बातोंको याद करते रहो और कष्टोंसे बचनेके लिये सांख्यधान होकर परमात्मासे प्रीति करो ; तभी तुम्हारा भला होगा । तुम्हारे सारे नातेदार मतलबी हैं ; केवल एक बड़ सच्चा सहायक और रक्षक है । यही सब विषय नीचेके अंजनोंमें कहीं खूबीसे दिखाये हैं :—