वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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युवावस्था।
बालावस्थाके बाद युवावस्था आती है। यद्यपि यह अवस्था नौबेसे ऊपर बढ़ती है ; पर यह और भी बुरी है। १५१६ सालकी अवस्थामें शादी कर दी जाती है। इसे 'शादी खाने आबादी' कहते हैं, पर यह है वर्वादी। बेचारेके पैरोंमें पेसी बेड़ियाँ डाल दी जाती है, कि उसे जन्म-भर आज्ञादी नहीं मिलती। लोहे और काठकी बेड़ियोंसे चाहे मनुष्यको छुट-कारा मिल जाय ; पर स्त्रीरूपी बेड़ियोंसे जीवन-भर छुटकारा नहीं मिलता। अब तक पढ़ने लिखनेकी चिन्ता और गुरु प्रभृतिके भयसे ही दुखी रहना पड़ता था ; पर अब और फिक —चिन्तायेँ सिर पर सवार होती हैं। वही माता-पिता, जिन्होंने शादी-शादी कहकर पैरोंमें स्त्रीरूपी बेड़ियाँ पहना दी थीं, उठती जवानीके पट्टेको भून-भूनकर खाते हैं। कहते हैं,—“हमने तुझे पढ़ा-लिखा दिया, तेरा शादी-व्याह कर दिया ; हमारा कर्तव्य पूरा हुआ ; अब तू क्या। अगर नहीं कमाता है, तो अपनी स्त्री को ठेकर अलग हो जा।” इस समय बेचारे की जान पर बन आती है। नौकरी या रोज़गारका मिलना कोई खेल नहीं ; इसलिये बेचारा भीतर-ही-भीतर जल-जलकर खाक होने लगता है। अगर धनी घर में जन्म होता है, तो ये कष्ट भोगने नहीं पड़ते। उस