वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 496, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ें( ३८२ )
इतना भी ज्ञान बालकको नहीं होता। जिस तरह ज्येष्ठ आषाढ़में पृथ्वी तपती रहती है ; उसी तरह सुख-दुःख और इच्छा प्रभृतिके शोषासे बालक जलता रहता है।
बालकमें अशक्तता और पराधीनता इतनी होती है कि, वह आप न उठ सकता है, न बैठ सकता है, न चल सकता है और न खा सकता है। कोई उठा लेता है, तो गोदमें आ जाता है ; नहीं तो अपने मल-मूत्रमें ही पड़ा-पड़ा रोया करता है। कोई दूध पिठा देता है, तो पी लेता है ; नहीं तो रोता रहता है। यह शिशु अवस्था है। इस अवस्थाको पार कर वह बालकावस्थामें आता है ; तब लिखने-पढ़नेका भार उसके सिर पर आता है। उस समय बालक गुरुसे इस तरह डरता है ; जिस तरह कोई यमदूतसे डरता है। ज़रा भी दृढ़ता करने या न पढ़नेसे माता-पिता और गुरु प्रभृतिकी ताड़नायें सहनी पड़ती हैं। अगर उसे कुछ रोग हो जाता है, तो वह साफ-साफ कह नहीं सकता और उसे सह भी नहीं सकता ; भीतर-ही-भीतर जलता और दुःख पाता है। यह अवस्था महामूर्खतापूर्ण है। बालक कभी कहता है कि, मुझे बर्फका टुकड़ा भून दो ; कभी कहता है कि, आकाशका चाँद उतार दो। भोला इतना होता है कि, थालीमें जल भरकर चाँद दिखाने और दूधकी जगह आटा घोळ कर दे-देनेसे भी राजी हो जाता है। इस अवस्थामें दुःख-ही-दुःख है; सुख और स्वाधीनता का नाम भा नहीं। परमात्मा यह अवस्था किसीको न दे।