वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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बालावस्था ।
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बालावस्था भी परम दुःखकी मूल है। इस अवस्थामें प्राणी पराधीन और अतीव दीन रहता है। अशक्तता, मूर्खता, इच्छा, वपलता, दीनता और दुःख-सन्ताप,—ये विकार इस अवस्थामें आ जाते हैं। बालक एक पदार्थ की ओर दौड़ता, दूसरेको पकड़ता और तीसरेकी इच्छा करता है। वह बड़ी-बड़ी इच्छायें करता है, पर उसकी इच्छायें पूरी नहीं होती। वह सदा तृष्णाके फेरमें पड़ा रहता और क्षण-क्षणमें भयभीत होता है। उसे कभी शान्ति प्राप्त नहीं होती। जिस तरह कंदलीबनका हाथी, सड़लोंमें बँधा हुआ, दीन हो जाता है ; उसी तरह यह चैतन्य पुरुष, बालावस्था रूपी सड़लोंमें, महादीन हो जाता है। जिस तरह क्षण-क्षणमें द्वारकी और दौड़ने वाले कुत्तेका अपमान होता है ; उसी तरह बालकका अनावर होता है। उसे सदा माता-पिता और बान्धवोंका भय रहता है। यहाँ तक कि, अपनेसे बड़े बालकों और पशु-पक्षियोंसे भी उसे भीत रहना पड़ता है। स्त्रीके नयन और नदीके प्रवाहसे भी बोलक और मनकी चञ्चलता अधिक है। सच तो यह है कि, बालक और मनकी चञ्चलता समान है ; और सबको चञ्चलता इन दोनोंकी चञ्चलताके नीचे है। जिस तरह वेश्याका मन एक पुरुषमें नहीं उहरता, उसी तरह बालकका मन भी एक पदार्थमें नहीं उहरता।
इस काम या पदार्थसे मेरा अनिष्ट-होगा या कल्याण,