वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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गर्भावस्था।
माताके छून और पिताके वीर्यासे, गर्भाशयमें, प्राणीकी देह बनती है। चार मास बाद, उस देहमें जीव आ जाता है। उस समय वह और अन्धकारपूर्ण क्रेदखानेमें हाथ-पाँव-बन्धा हुआ उल्टा लटकता रहता है। मुँह पर फिल्ली होनेके कारण, न बोल सकता है और न रो सकता है। जिस स्थानमें वह नौ मास तक रहता है, वह स्थान—गर्भाशय—मल, मूत्र, राघ, छून, पीव और कफ प्रभृति महागन्धे पदार्थोंसे भरा रहता है। वह जगह गन्दी होनेके सिवा, इतनी तङ्ग भी है कि, वहाँ वह अच्छी तरह फैल-पसर भी नहीं सकता। उसी मैली और तङ्ग जगहमें, जो साक्षात् नरक है, वह बड़े ही कष्टसे नौ महीने काटता है। नरक-कुण्डके कष्टोंसे दुःखी होकर, वह परपातमाको याद करता और उससे वादा करता है कि, इस बार मैं जन्म लूँगा, तो, और कुछ न करके, केवल आपकी उपासना ही करूँगा। खैर, भगवान् दयाकर उसे बाहर निकालते हैं; पर बाहर आतेही वह, माया-मोहमें फँसकर, ईश्वरको भूल जाता है।