भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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दोहा ।

रोग वियोग विपत्ति बहु, देह आयु आधीन ।

निडर विधाता जग रच्यो, महा अथिरता लीन ॥१०५॥

105. People's health is destroyed by hundreds of mental and physical diseases. Wherever there is wealth misfortunes come in like thieves, breaking open the doors of houses. He who is born, soon falls helplessly into the jaws of death from which there is no escape. Then what is there in this world which is made by the wilful Brahma to last for ever ?

कृच्छ्रेणामेव्यमध्यं नियमिततदुभिः स्थायते गर्भमध्ये कान्ता- विरलेषुः स्वव्यतिकर विषमे यौवने विप्रयोगः ॥ नारीणां मय- वज्ञा विलसति नियतं वृद्धभावोऽप्यसाधुः संसारे रे मनुष्या वदत यदि सुखं स्वल्पमप्यस्ति किंचित् ॥१०६॥

प्रथमावस्थामें प्राणी माताके गर्भमें पड़ा रहता है। वहाँ वह, मलमूत्र राख लोहू प्रशुति गन्दी चीज़ोंके बीचमें पड़ा हुआ, बड़े-बड़े कष्ट भोगता और हिल भी नहीं सकता। दूसरी अवस्था—जवानोंमें, वह अपनी प्यारी स्त्रीकी जुदाईके दुःख सहन करता है। तीसरी अवस्था—बुढ़ापेमें, वह झिंयोंसे अनाहत होकर दुःख में पड़ा रहता है। हे मनुष्यो ! इस संसारमें जरासा भी सुखे हो तो हमें बताओ ॥१०६॥

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