भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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से मालूम होते हैं। स्त्री-पुत्र आदि तेरा धन तुझसे छीन-छीन कर खॉयेंगे। और कुटुम्बी लोग भी तुझे चारों ओर से लूटेंगे और मोठी-मोठी बातें बनाकर तेरे लिपटेंगे। तेरे लिये वे धन-दौलत, जीव-जान और सर्वस्व तक खाहा कर देनेको ढीगें मारेंगे, लेकिन जब तुझ पर संकट पड़ेगा, काल तुझ पर आक्रमण करेगा, तब तेरा कोई न होगा। अन्तकाल ही कठिन है और उस समय सब तुझे छोड़-छोड़ कर दूर हो जायेंगे। “सुन्दरदास” कहते हैं, इसलिये यह सब प्रपञ्च भूठा है; कोई किसीका साथी नहीं है। मरने पर सब स्वप्नकी माया की तरह बिलाय जायेंगे।

घड़ी-घड़ी उग्र धटती है और क्षण-क्षण काया छीजती है। जिस तरह मिट्टीका ढेला भीजते ही गल जाता है; उसी तरह यह काया गल जाती है। अरे मूढ़! मुक्तिके द्वार पर आकर, होशियार क्यों नहीं होता? मनुष्य-चोला पाकर, आवागमनसे पीछा क्यों नहीं छुड़ाता? यह चोला तुझे उसी तरह बारम्बार नहीं मिलेगा; जिस तरह त्रियाका तेल बार-बार नहीं चढ़ता। तू पुण्य करले और अखण्ड अविनाशी ब्रह्मको भजले। इसमें अन्तर पड़नेसे अन्तर पड़ता है और इसमें लग जानेसे जीव ब्रह्ममें मिल जाता है। इस मनुष्य-जन्मका मिलना जूएका सा खेल है। अब चाहे जीत या हार; बाज़ी मार ले और चाहे खो दे।