भारतकोश
संग्रह पर लौटें

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

( ३८२ )

इतना भी ज्ञान बालकको नहीं होता। जिस तरह ज्येष्ठ आषाढ़में पृथ्वी तपती रहती है ; उसी तरह सुख-दुःख और इच्छा प्रभृतिके शोषासे बालक जलता रहता है।

बालकमें अशक्तता और पराधीनता इतनी होती है कि, वह आप न उठ सकता है, न बैठ सकता है, न चल सकता है और न खा सकता है। कोई उठा लेता है, तो गोदमें आ जाता है ; नहीं तो अपने मल-मूत्रमें ही पड़ा-पड़ा रोया करता है। कोई दूध पिठा देता है, तो पी लेता है ; नहीं तो रोता रहता है। यह शिशु अवस्था है। इस अवस्थाको पार कर वह बालकावस्थामें आता है ; तब लिखने-पढ़नेका भार उसके सिर पर आता है। उस समय बालक गुरुसे इस तरह डरता है ; जिस तरह कोई यमदूतसे डरता है। ज़रा भी दृढ़ता करने या न पढ़नेसे माता-पिता और गुरु प्रभृतिकी ताड़नायें सहनी पड़ती हैं। अगर उसे कुछ रोग हो जाता है, तो वह साफ-साफ कह नहीं सकता और उसे सह भी नहीं सकता ; भीतर-ही-भीतर जलता और दुःख पाता है। यह अवस्था महामूर्खतापूर्ण है। बालक कभी कहता है कि, मुझे बर्फका टुकड़ा भून दो ; कभी कहता है कि, आकाशका चाँद उतार दो। भोला इतना होता है कि, थालीमें जल भरकर चाँद दिखाने और दूधकी जगह आटा घोळ कर दे-देनेसे भी राजी हो जाता है। इस अवस्थामें दुःख-ही-दुःख है; सुख और स्वाधीनता का नाम भा नहीं। परमात्मा यह अवस्था किसीको न दे।

( ३८३ )

युवावस्था।

बालावस्थाके बाद युवावस्था आती है। यद्यपि यह अवस्था नौबेसे ऊपर बढ़ती है ; पर यह और भी बुरी है। १५१६ सालकी अवस्थामें शादी कर दी जाती है। इसे 'शादी खाने आबादी' कहते हैं, पर यह है वर्वादी। बेचारेके पैरोंमें पेसी बेड़ियाँ डाल दी जाती है, कि उसे जन्म-भर आज्ञादी नहीं मिलती। लोहे और काठकी बेड़ियोंसे चाहे मनुष्यको छुट-कारा मिल जाय ; पर स्त्रीरूपी बेड़ियोंसे जीवन-भर छुटकारा नहीं मिलता। अब तक पढ़ने लिखनेकी चिन्ता और गुरु प्रभृतिके भयसे ही दुखी रहना पड़ता था ; पर अब और फिक —चिन्तायेँ सिर पर सवार होती हैं। वही माता-पिता, जिन्होंने शादी-शादी कहकर पैरोंमें स्त्रीरूपी बेड़ियाँ पहना दी थीं, उठती जवानीके पट्टेको भून-भूनकर खाते हैं। कहते हैं,—“हमने तुझे पढ़ा-लिखा दिया, तेरा शादी-व्याह कर दिया ; हमारा कर्तव्य पूरा हुआ ; अब तू क्या। अगर नहीं कमाता है, तो अपनी स्त्री को ठेकर अलग हो जा।” इस समय बेचारे की जान पर बन आती है। नौकरी या रोज़गारका मिलना कोई खेल नहीं ; इसलिये बेचारा भीतर-ही-भीतर जल-जलकर खाक होने लगता है। अगर धनी घर में जन्म होता है, तो ये कष्ट भोगने नहीं पड़ते। उस

( ३८४ )

अवस्थामें और ही नाशके समान आ इकट्ठे होते हैं। धन, यौवन और प्रभुता इनमेंसे प्रत्येक अनर्थकी जड़ है। जहाँ ये सब इकट्ठे हो जाये, वहाँका तो कहना ही क्या ? जिस तरह धन पानेकी आशासे, निर्धन लोग धनीको घेर रहते हैं ; उसी तरह, इस अवस्थामें, सब दोष आकर युवकको घेर लेते हैं। गुंवावस्था रुपी रात्रिको देखकर काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार “आत्मज्ञान-रुपी धनको” लूटते हैं ; इसलिये बिस्त्र शान्त नहीं रहता और विषयोंकी ओर दौड़ता है। विषयोंको संयोग होनेसे तृष्णा बढ़ती है। इस तृष्णा-राक्षसीके मारे प्राणी जन्म-जन्मान्तरमें दुःख भोगता है।

इस अवस्थामें विषय-भोगोंकी ओर मन त्रिषादाँ रहता है। स्त्री अत्यधिक प्यारी लगती है। नितनयी स्त्रियों पर मन चला करता है। अगर कोई मित्र आता है, तो नवयुवक उससे कहता है,—“अरे यार ! वह नाज़नी कैसी खूबसूरत है ! उसने तो मेरा दिलहो ले लिया। उसके दीवार बिना मुझे क्षण-भर भी चैन नहीं। वह कैसे मिले ?” बस ; ऐसीही बातें अच्छी लगती हैं। अगर इच्छित स्त्री नहीं मिलती, तो मनमें क्रोध होता है ; क्रोधसे मोह होता है और मोहसे बुद्धि नष्ट हो जाती है। बुद्धिके नष्ट होनेसे, मनुष्य बिना पतवारकी नावकी तरह नष्ट हो जाता है। समुद्रमें अगाध जल भरा है। उसमें अनन्त तूफ़ानें उठती हैं। इतना विशाल महासागर, ईश्वर-आज्ञाके विरुद्ध, मर्यादाको नहीं मेटता ; पर

( ३८५ )

युवावस्था शास्त्र और ईश्वर दोनोंको आज्ञाओंको भेट देती है। जिस तरह अँधेरेमें पदार्थोंका ज्ञान नहीं रहता ; उसी तरह युवावस्थामें शुभ-अशुभ या भले-बुरेका ज्ञान नहीं रहता। जवानी दीवानोंमें लोक-लाज और हया-शर्म सब हवा हो जाती हैं।

लिख चुके हैं, युवा अवस्थामें स्त्री सबसे अधिक प्यारी लगती है। अगर किसी तरह छोसे वियोग हो जाता है, तो उसकी वियोगाश्रिमें पुरुष इस तरह जलता है, जिस तरह दावाश्रिसे वनके वृक्ष जलते हैं। युवावस्थामें बड़े-से-बड़े बुद्धिमानोंकी बुद्धि उसी तरह मलिन हो जाती है ; जिस तरह वर्षाकालमें निर्मल नदी मलिन हो जाती है। इस अवस्थामें “वैराग्य और सन्तोष प्रभृति” गुणोंका अभाव हो जाता है।

मर्यादा-पुरुषोत्तम रामचन्द्रजीने महामुनि वशिष्ठजीसे कहा है—“हे मुनिवर ! जिस महासागरमें अनन्त और अगाध जलराशि है तथा लाखों करोड़ों बड़े-बड़े मगर, मच्छ और बड़ियाल हैं, उसका पार करना महा कठिन है ; पर मैं उसका पार करना उतना मुश्किल नहीं समझता, जितना कि मैं इस युवावस्थाका पार करना कठिन समझता हूँ। युवावस्था विषयोंकी ओर ले जाने वाली, महा अनर्थकारी और लोक-परलोक नशाने वाली है। जिस तरह आकाशमें बनका होना आश्चर्य्यकी बात है ; उसी तरह युवावस्थामें सब सुखोंके मूल “वैराग्य, विचार, सन्तोष और शान्ति” का होना आश्चर्य्य है।”

२५

( ३८६ )

महाराजा रामचन्द्र एक और जगह कहते हैं :—“गुवावस्था ! सुक्र पर दया करके तु न आना ! मुझे तेरी ज़रूरत नहीं, क्योंकि मेरी समझमें तेरा आना दुःखांका कारण है। जिस तरह पुत्रके मरनेका सङ्कट पिताके सुखके लिए नहीं होता ; उसो तरह तेरा आना भी सुखके लिए नहीं होता।”

वृद्धावस्था ।

यह अवस्था पहली दो अवस्थाओंसे भी बुरी है। बाल्यावस्था महा जड़ और अशक्त है ; गुवावस्था अनर्थ और पापों को मूल है तथा वृद्धावस्थामें शरीर जज्जर और बुद्धि क्षीण हो जाती है, कृब निकल आता है, दांत गिर पड़ते हैं, बाल सफेद हो जाते हैं, बल कम हो जाता है, आँखोंसे कम सूक्ष्मता या सूक्ष्मता ही नहीं, कानोंसे सुनाई नहीं देता, पैरोंसे चला नहीं जाता, लकड़ी टेक-टेक कर चलना होता है, कफ और खाँसी अपना दौर-दौरा जमा लेते हैं, हर समय साँस फूलने लगता है। बहुत क्या—स्वारे रोग, शत्रुओंकी तरह मौका पार्कर, इस अवस्थामें चढ़ाई कर देते हैं। खी-पुत्रादिक सभी नाते-रिश्तेदार बूढ़ेको उसो तरह त्याग देते हैं ; जिस तरह पके फलको वृक्ष और निकम्मे बूढ़े बैलको बैलवाला त्याग देता है।

( ३८० )

जरा अवस्था या बुढ़ापा मृत्युका पेशासीमा या लेनडोरी है। जिस तरह साँझ होनेसे रात निकट आती है ; उसी तरह बुढ़ापेके आनेसे मौत नज़दीक आती है। सन्ध्याके आने पर जो दिन की इच्छा करते हैं और बुढ़ापेके आने पर जो जीने की अभिलाषा रखते हैं, वे दोनों ही मूर्ख हैं। जिस तरह बिलली बूहेके खा जानेकी घातमें रहती है और चाहती है कि, बूहा आवे तो खा जाऊँ ; उसी तरह मौत देखती रहती है कि, बुढ़ापा आवे तो मैं इसे ग्रहण करूँ। ऐसा जान पड़ता है, मानो बुद्धावस्था कालकी सखी है। वह आकर योगरूपी आगसे शरीरके मांसको जलाती या पकाती है और उसका स्वामी—काल आकर प्राणीको भक्षण कर जाता है। अशक्ता, अङ्गपीड़ा और खाँसी,—ये तीनों कालकी पर-रानियाँ हैं। जिस तरह बनमें वाघिन आकर पहले शब्द करती या गरजती और मृगका नाश करती है ; उसी तरह शरीर-रूपी बनमें खाँसी-रूपी वाघिन आकर बल-रूपी मृगका नाश करती है। जिस तरह चन्द्रमाके उदय होनेसे कमलिनो खिल उठती है ; उसी तरह बुढ़ापेके आनेसे मृत्यु प्रसन्न होती है। जरा बड़ी ज्वर्दस्त है। इसने बड़े-बड़े शत्रुहन्ताओंके मान मर्दन कर दिये हैं। यह शरीरको आगकी तरह जलाती है। जिस तरह वृक्षमें आग लगती है, तब धूआँ निकलता है ; उसी तरह शरीर-वृक्षमें जरा-रूपी अश्विके लगनेसे तृष्णा रूपी धूआँ निकलता है। जरा-रूपी ज्वांरोंमें बँधनेसे मनुष्य दीन

( ३८८ )

हो जाता है, अङ्ग शिथिल हो जाते हैं, बल क्षीण हो जाता है, इन्द्रियां निर्बल हो जाती हैं और शरीर जर्जर हो जाता है ; पर तुष्णा उठटी बलवती हो जाती है। इस अवस्थामें घोर दुःख है ; सुखका तो लेश भी नहीं।

जिस समय पुण्य बूढ़ा हो जाता है, उसमें क्रमानेकी शक्ति नहीं रहती ; तब सभी उसे पागल समझ कर, उसकी हँसी करते और उसके पुत्र-पौत्रादिक उसे गुरी नज़रसे देखते हैं। यहाँ तक कि, खास उसकी अर्द्धाङ्गी उससे घृणा करने लगती है। पुत्र उसे कोई चीज़ नहीं समझते। और लोग भी उसे वृथाकी बला समझते हैं। पुत्र और पुत्रबधुए उसे एक रूटी सी खाट पर पौलीमें डाल देते हैं और उसके थूकने को एक ठिकरा रख देते हैं। आप समय पर अच्छे-से-अच्छा खाना खाते हैं ; पर उसे, समय-बे-समय, जब याद आ जाती है, बचा-खुवा वासी-कूसी खाना एक पुरानी और फूटीसी थाली या ठीकरेमें रख कर दे आते हैं। जब उसका थूक-खबार या मछ-मूत्र उठाते हैं, तब उसे सैकड़ों तरहकी न कहने योग्य बातें सुनाते हैं,—“अब मर क्यों नहीं जाते ? जवान-जवान मरे जाते हैं, पर तुमको मौत नहीं आती !” प्रभृति। यह दुर्गति बुढ़ापेमें होता है।

अगर घर-गृहस्थीमें सौभाग्यसे कोई दुःख नहीं होता, घरवाले स्त्री-पुत्र आदि अच्छे मिल जाते हैं, घरमें परमात्माकी दयासे सुखेश्वर्यके सभी सामान मौजूद होते हैं ; तो दूसरोंका

( ३८६ )

भला न चीतने वाले, दूसरोंको अच्छी अवस्थामें देखकर कुदने वाले ही तड़क करते हैं। वह अपनी ओरसे उसका सर्वनाश करनेमें कोई बात उठा नहीं रखते। यद्यपि ऐसी बातोंसे उन्हें कोई लाभ नहीं होता; तोभी वे बिल्हों की सी करतूतोंसे बाज़ नहीं आते; हृदय नाकमें दम किये रहते हैं। मतलब यह कि, संसारमें दुःखोंकी ही अधिकता है। यहाँ सुख है ही नहीं। अगर है, तो बराय नाम और उससे परिणाममें कोई लाभ नहीं; बरन हानि है। उस्ताद ज़ौक कहते हैं :—

राहतो रंज ज़मानेमें हैं दोनों, लेकिन ।

यों अगर एक को राहत है, तो है चारको रंज ॥

निरस्तन्देह संसारमें सुख और दुःख दोनों ही हैं—पर बहुलता दुःख ही की है, क्योंकि चार दुःखियोंमें मुश्किलसे एक सुखी मिलता है।

उस्ताद ज़ौक ही एक जगह और कहते हैं :—

हलावते शरमो पासदारी, जहाँमें है जौक रजोख्वारी ।

मजेसे गुज़री, अगर गुज़ारी किसीने वे नामोंनंग होकर ॥

संसारसे दूर रहना अच्छा; यहाँके सम्बन्धोंकी जड़ेंमें दुःख और बलेश भरा हुआ है। जिसने अपनी जिन्दगी खुप-चाप गुज़ार दी; सच तो यह है, उसने अच्छी गुज़ार दी।

सारंग यह, कि सभी महात्माओंने संसारके दुःखोंका

( ३६० )

अनुभव करके औरोंको चेतावनी दी है, कि इस मिथ्या जगत् की मायामें न भूलो ; इससे दिल मत लगाओ, किन्तु इसके बनानेवालेके साथ दिल लगाओ । इसके साथ दिल लगानेसे तुम्हारा बुरा और उसके साथ दिल लगानेसे भला है ।

गोस्वामी तुलसीदासजीने कहा है :—

सलिल युक्त शोषित समुक्त, पल श्रु अस्थि समेत । बाल कुमार युवा जरा, है सु समुक्त कर चेत ॥ ऐसेहि गति अवसान की, तुलसी जानत हेत । ताते यह गति जानि जिय, अविरल हरि चित चेत ॥

स्त्रीकी रज और पुरुषके वीर्यसे तुम्हारे शरीरके सूत, मांस और हड्डियाँ बनीं । फिर तुम गर्भाशयसे बाहर आये । फिर बालक अवस्थामें रहे ; उसके बाद युवावस्था आई ; फिर बुढ़ापा आया । फिर तुम मरे और कर्मफल भोगनेको फिर जन्म लिया । इस तरह लोक-वासनाके कारण तुम्हें बारम्बार जन्मना और मरना पड़ता है । इसमें कैसे-कैसे कष्ट उठाने पड़ते हैं, इन बातोंको याद करते रहो और कष्टोंसे बचनेके लिये सांख्यधान होकर परमात्मासे प्रीति करो ; तभी तुम्हारा भला होगा । तुम्हारे सारे नातेदार मतलबी हैं ; केवल एक बड़ सच्चा सहायक और रक्षक है । यही सब विषय नीचेके अंजनोंमें कहीं खूबीसे दिखाये हैं :—

( ३६२ )

भजन ( राग धनाश्री ) ।

हरि बिन और न कोई अपना, हरि बिन और न कोई रे । मात पिता सुत बन्धु कुटुम्ब सब, स्वारथके ही होई रे ॥१॥ या कायाको भोग बहुत दे, मरदन कर-कर सोई रे । सो भी छूटत नैक न खसकी, संग न चाली घोई रे ॥२॥ घरकी नारि बहुत ही प्यारी, तनमें नहीं दोई रे । जीवत कहती संग चर्लुंगी, डरपन लागी सोई रे ॥३॥ जो कहिये यह द्रव्य आपनो, जिन उज्ज्वल मति खोई रे । आवत कष्ट रखत रखवारी, चलत प्राय ले जोई रे ॥४॥ इस जगमें कोई हित न दीखे, मैं समझाऊँ तोई रे । चरणदास-सुखदेव कहैं, ये सुन लीजो सब कोई रे ॥५॥

भजन ( राग सोरठ ) ।

सुख राखो वा दिनकी कछु तुम, सुख राखो वा दिनकी रे । जादिन तेरी यह देह छुटैगी, ठौर बसौगे बन की रे ॥१॥ जिनके संग बहुत सुख कौनूँ, तेरो मुख ढँक होयँगे न्योरे । जमके त्रास होयँ वह भाँती, कौनूँ छुटावनहारे रे ॥२॥

( ३६२ )

देहल लों तेरी नारि चलेगी, बड़ी पौल लों माई रे । भरघट लों सब बीर भतीजे, हंस अकेला जाई रे ॥३॥ द्रव्य पड़े और महल खड़े रहें, पूत रहें घर माहीं रे । जिनके काज पचै दिन राती, सो सँग चालत नाहीं रे ॥४॥ देव पितर तेरे काम न आवैं, जिनकी सेवा लोवै । चरणदास-सुखदेव-कहत हैं, हरि बिन मुक्ति न पावै ॥५॥

परमात्माकी भक्ति करो तो ऐसी करो कि, परमात्माके सिवा अन्य किसी भी देवी-देवता या संसारी पदार्थको कुछ समझो ही नहीं ; यानी उस जगदीशके सिवा सबको भूटे, निकम्मे और नाशमान समझो । केवल उसके प्रेममें रूकूँ हो जाओ और उससे प्रेमके बदलेमें कुछ माँगो नहीं ; तब देखो, क्या आनन्द आता है ! कबीर साहब कहते हैं :—

सुमिरनसे मन लाइये, जैसे दीप पतंग । प्रान तजै दिन एकमें, जरत न मोरे अंग ॥

इसी बातको उस्ताद जौड़ने किस तरह कहा है :—

कहा पतंगने यह, दारे शमा पर चढ़ कर । अजब मजा है, जो भर ले किसीके सर चढ़ कर ॥

ऐसी प्रीतिको ही प्रीति कहते हैं । दीपक और पतङ्ग, मछली और जल, नाद और कुण्डल, चातक और मेघ,—इनकी

( ३२३ )

प्रोति आदृश प्रोति है । ऐसी प्रोतिसे ही सच्ची सिद्धि मिलती है—ऐसी प्रोतिवालोंको ही परमात्माके दर्शन होते हैं ।

दोहा ।

सहो गर्भदुख जन्मदुख, जीवन त्रिया वियोग ।

बुद्ध भये सबहिन तज्यो, जगत किधौं यह रोग ॥

106. In their earliest stage of existence creatures remain in their mothers' wombs in the midst of impurities suffering great hardships with motionless bodies. In youth comes the unbearable pain of separation from consorts. Then comes the miserable old age marked unmistakably by the insolence of women. Thus O men, let us know if there is any the least happiness in this world !

ब्रायुर्वर्षशतं नृणां परिमितं राज्ञो तदर्थं गतं

तस्यार्द्धस्य परस्य चार्द्धमपरं बालत्वबुद्धत्वयोः ॥

शेषं व्याधिर्वियोगदुःखसहितं सेवादिभिर्नियते

जीवे वारितरंगचञ्चलतरे सौख्यं कुतः प्राणिनाम् ॥१०७॥

मनुष्यकी उम्र औसत सौ बरसकी मानी गई है । उसमें से आधी तो रातमें सोनेमें गुजर जाती है ; बाकीमें से एक भाग बचपनमें और एक भाग बुढ़ापेमें चला जाता है । शेषमें जो एक भाग बचता है,—वह रोग, वियोग, पराई चाकरी, शोक और हानि प्रभृति नाना प्रकारके क्लेशोंमें बीत जाता है । जल-तरङ्गवत् चञ्चल जीवनमें प्राणियोंके लिये सुख कहाँ है ? ॥१०७॥

( ३६४ )

आयुका हिसाब ।

खुलासा—शास्त्रोंमें मनुष्यकी आयु सौ बरसकी मानी गई है। उसमेंसे पचास बरस; बानी आधी आयु तो रातके समय सोनेमें बीत जाती है। अब रहे पचास बरस; उनके तीन भाग कीजिये। पहले १७ साल बचपनकी अज्ञानावस्था और पराधीनतामें बीत जाते हैं। दूसरे १७ साल बुढ़ावस्था में चले जाते हैं और शेष २६ साल नाना प्रकारके रोग, शोक, वियोग, हानि-लाभकी चिन्ता और दूसरोंसे लड़ने-भगड़ने प्रभृतिमें बीत जाते हैं।

प्राणीको कभी सुख नहीं।

पचास सालमेंसे पहले १७ बरस बचपनमें बीतते हैं। इस अवस्थामें, पैदा होते ही, बच्चा पराधीन होता है। आप उठ-बैठ चल-फिर नहीं सकता। कोई उठा लेता है, तो उठा आता है; नहीं तो मल-मुत्रमें ही पड़ा रहता है। कोई खिला-पिला देता है, तो खा-पी लेता है; नहीं तो पड़ा-पड़ा रोया करता है। कौसी बुझे अवस्था है! इसमें जरा भी सुख दिखाई नहीं देता। इसके बाद ज्यों ही वह १६ सालका

( ३६५ )

हुआ, कि उस पर पढ़ने-लिखनेका भार आ पड़ता है। रात-दिन पढ़ने-लिखनेको चिन्तामें बेचारा पागलसा बना रहता है।

इसके बाद जवानी आती है। जवानीमें स्त्री आ जाती है। अगर धन नहीं कमाता, तो माता-पिता कहते हैं :— “हमने तुम्हारी शादी कर दी, बना जितना पढ़ा-लिखा दिया, अब कमाओ; यदि नहीं कमाते, तो अपनी लुगाईको लेकर अलग हो जाओ। हमसे तुम्हारा दोनो का खर्च उठाया नहीं जाता।” अगर कोई धन्य लग गया, तो ख़ैर; नहीं तो जब तक नौकरी-चाकरी या रोज़गार नहीं लगता, रात-दिन बेचारा भाड़में चनो को तरह भूना जाता है। अगर धन्य भी लग जाता है, तो स्वामीके राज़ी या नाराज़ होनेको चिन्ता लगी रहती है अथवा कारोबारके नफ़े-नुकसानकी फिक शरीर को भीतर-ही-भीतर जलाये देती है। इसी बीचमें रोग भी होते हैं। दूसरो से मुक़द्दमेबाज़ी होती है। इस तरह इस अवस्थामें भी चैन नहीं मिलता।

अब रहा बुढ़ापा। यह तो दुःखों का भाण्डार ही है। इसमें अनेक रोग शत्रुओं की तरह चढ़ाई करते हैं, शरीर काम नहीं देता और घरके लोग अनादर करते हैं। इस अवस्थामें और भी मिट्टी ख़राब होती है। इस तरह स्पष्ट है, कि प्राणीको इस बञ्चल जीवनमें क्षण-भर भी सुख नहीं मिलता।

( ३६६ )

दुःखपूर्ण जीवनसे प्राणी सन्तुष्ट !

यद्यपि इस जीवनमें जरा भी सुख नहीं है, क्षण-भर भी शान्ति नहीं है ; तो भी मनुष्यका ऐसा मोह है कि, वह मरना नहीं चाहता ; मौतका नाम सुननेसे काँप उठता है । अगर इस जीवनमें सुख होता, तो न जाने क्या होता ? और कुछ और दुःखों में भी यदि मनुष्य मरता है तो कहता है—“हम कुछ न जिंये, अगर और कुछ दिन जीते तो.....”

किसी कविने कहा है—

हो उग्र खिज भी, तो कहेंगे वक्के मर्ग ।

हम क्या रहे यहाँ, अभी आये अभी चले ॥

चाहे हजारों बरसको उग्र हो जाय, मरते समय यही कहेंगे, इस संसारमें कुछ भी न रहे, अभी आये अभी जाते हैं । जीनेकी अभिलाषा बनी ही रहती है ।

घृणित जीवनसे भी क्यों घृणा नहीं होती ?

मनुष्य-जीवनमें दुःख-ही-दुःख हैं ; फिर भी मनुष्य इस घृणित जीवनसे सन्तुष्ट क्यों रहता है ? इससे उसे घृणा क्यों नहीं होती ? जिस तरह मैलेसे भट्टीको घृणा नहीं होती ; उसी तरह जिनके स्वशवमें मनुष्य-जीवनके दुःख समा गये हैं,

( ३६७ )

उन्हें इस मलिन और घृणित जीवन—दुःखपूर्ण जीवनसे घृणा नहीं होती। मैलेका कोड़ा मैलेमें ही सुखी रहता है; मैलेसे निकलनेमें उसे दुःख होता है। यही हाल उनका भी है, जिनके अन्तःकरण मलिन हैं। वे मलिन गृहस्थाश्रममें ही सुखी हैं।

मनुष्यका कर्तव्य क्या है ?

मनुष्य-जन्म बड़ा दुर्लभ है। यह ८४ लाख योनियाँ भोगने के बाद मिलता है। अगर मनुष्य इस मानव-जीवनमें भी चूक जाता है, आवागमन—जन्म-मरण—के फन्देसे छूटनेका उपाय नहीं करता, तो पछताता और रोता है; पर यह सुअवसर उसे फिर जल्दी नहीं मिलता। इस पर एक दृष्टान्त है :—

अवसर चूके पछताना होता है।

किसी राजाके ३६० रानियाँ थीं। राजा विदेश गया था। जिस दिन वह लौटकर आया उस दिन ३६० वे नम्बरकी रानी के यहाँ उसके जानेकी बारी थी। रानीने दासियों से कह दिया कि, मैं खोती हूँ; जब राजाजी आवें, मुझे जगा देना। रातको राजा आया; किन्तु दासियों ने भयके मारे रानीको न जगाया। सवेरे राजा चला गया। रानीने उठकर पूछा—“क्या राजाजी आये थे?” दासियों ने कहा—“हाँ, आये थे।

( ३६८ )

हम लोग उनके भयके मारे आपको जगा न सकीं।” रानी बहुत रोई पड़ताई। उसे ३६० दिन तक फिर राह देखनी पड़ी। बस; यही हाल उनका है, जो इस मनुष्य-जन्मको वृथा गँवा देते हैं। इसमें भगवद्भक्ति या उपासना नहीं करते। मर जाने पर, ८३ लाख योनियों को भोगकर, फिर कहीं ऐसा अवसर हाथ आता है। अतः मनुष्यको, सब जज्जाल छोड़कर, एक मात्र भगवद्भक्तिमें लगना चाहिये; एक क्षण भी व्यय न गँवाना चाहिये। दम निकले तो जगदीश्वर की याद करता हुआ ही निकले। इसीमें कल्याण है। साँसका भरोसा क्या? आया आया, न आया न आया। “गुरु-कौमुदी”में कहा है:—

अरे भज हरेनाम दोमधाम क्षण क्षण ।

बहिस्सरति निःश्वासे विश्वासः कः प्रवर्तते ॥

अरे जीव ! प्रत्येक क्षण हरि का नाम भज। हरि का नाम कल्याण-धाम है। जो साँस बाहर निकल जाता है, उसका क्या भरोसा? आवे, न आवे।

महाभारतमें आयुकी क्षणभंगुरता पर एक इतिहास लिखा है:—

एक ब्राह्मण राह भूल कर किसी भयानक वनमें जा निकला। वहाँ हाथी और सर्प प्रभृति भयानक हिसक पशु घूम रहे थे। एक पिशाचिनी हाथमें फाँसी लिये सामने आ

( ३६६ )

रही थी। उन्हें देखकर वह डरके मारे रक्षाका स्थान खोजने लगा। उसने एक अन्धा कूआ देखा, जिसमें घास छा रही थी तथा अनेक प्रकारकी बेले लग रही थीं। वह एक बेलको पकड़ कर, औंघा सिर किये, कूप में लटक गया। थोड़ी देर बाद उसने नीचेकी ओर देखा, तो एक बड़ा भारी सर्प मुँह फाड़े हुए नज़र आया; ऊपरकी ओर देखा, तो एक मस्त हाथी खड़ा दीखा। उस हाथीके छः मुख थे। उसका आधा शरीर सफेद और आधा काला था। जिस बेलको वह ब्राह्मण पकड़े हुए था, उसको वह हाथी खा रहा था और सफेद तथा काले दो चूहे उस बेलकी जड़को काट रहे थे।

इसका मतलब यों है :—वह ब्राह्मण जीव है। सघन वन यह संसार है। काम क्रोध आदि भयानक जीव इस जीवके नष्ट करनेको घूम रहे हैं। स्त्री-रूपी पिशाचिनी, भोग-रूपी पाश लेकर, इस जीवके फँसानेके लिये फिरती है। कूप में जो बेल लटक रही है, वही आयु है। उसीको पकड़कर यह जीव लटक रहा है। कूप में जो कालसर्प है, वह इस जीव का काल है, वह अपनी घात देख रहा है; ऊपर रात-दिन रूपी चूहे इस आयु रूपी बेलकी जड़ काट रहे हैं। वह हाथी वर्ष है। उसके छः मुख छः मृत्यु हैं। शुक्र और कृष्ण दो पक्ष उस हाथीके वर्ण या रंग हैं। मनुष्य इस तरह मौतके मुँहमें है। हर क्षण मौत उसे निगलती जा रही है; पर आश्चर्य्य है कि, इस आफतमें भी—मृत्यु-मुखमें, पड़ा हुआ भी—वह

( ४०० )

अपनेको सुखी सम्भक्ता है और इस नितान्त भयपूर्ण जीवनसे सन्तुष्ट है !

बीत गई सो बीत गई, आगेकी सुवि लो !

बहुतसे लोग कहा करते हैं, कि हमने सारी उम्र परपीड़न या पापकर्मोंमें खोई; भगवान्‌को कभी भूलसे भी याद न किया ; अब हम क्या कर सकते हैं ? यह कहना भारी भूल है । जो समय बीत गया, वह तो लौट कर आवेगा नहीं ; पर जो समय हाथमें है, उसे तो सुकर्म और ईश्वरकी यादमें लगाना चाहिये । यदि बाकी उम्र भी व्यर्थके भ्रमकटोंमें गँवाई जायगी, तो अन्तकालमें भारी पछतावा होगा । किसी कविने ठीक ही कहा है—

पुत्र कलत्र सुमित्र चरिल, धरा धन धाम है बन्धन जीको । बारहिँ बार विषैफल खात, अघात न जात सुधारस फीको । आन श्रोसान तजो अभिमान, कही सुन, नाम भजो सिय-पीको । पाय परमपद हाथ सों जात, गई सो गई, अब राख रही को ।

( ४०१ )

एक नटकी उपदेशपद कहानी ।

एक राजा बड़ा ही कञ्जूस था। उसने प्रचुर धन सञ्चय किया था; पर उससे न तो वह अपने पुत्रको सुख भोगने देता था और न स्वर्गके डरसे अपनी कन्याकी शादी ही करता था। एक दिन एक नट-नटी उसके दरबारमें आये और राजासे तमाशा देखनेकी प्रार्थना की। राजाने कहा—“अच्छा, अमुक दिन देखा जायगा।” नटनी बार-बार याद दिलाती रही और राजा बारबार-टालता रहा। अन्तमें नटनी ने वजीरसे कहा—“अगर राजा साहब तमाशा न देखें, तो हम चले जायें; हमें स्वर्ग खाते बहुत दिन हो गये।” यह सुन वजीरने राजासे कहा—“महाराज! आप तमाशा देख लीजिये। हम लोग चन्दा करके नटको कुछ दे देंगे। अगर आप तमाशा न देखेंगे, तो बड़ी बदनामी होगी।” राजा इस बात पर राजी हो गया। तमाशा हुआ। तमाशा करते-करते जब दो घड़ी रात रह गई और राजाने कुछ भी इनाम न दिया, तब नटनीने नटसे कहा :—

रात घड़ी भर रह गई, थाके पिप्पर आय ।

कह नटनी सुन मालदेह, सधुरा ताल बजाय ॥

नटनीकी बात सुनकर नटने कहा :—

२६