भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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आयुका हिसाब ।

खुलासा—शास्त्रोंमें मनुष्यकी आयु सौ बरसकी मानी गई है। उसमेंसे पचास बरस; बानी आधी आयु तो रातके समय सोनेमें बीत जाती है। अब रहे पचास बरस; उनके तीन भाग कीजिये। पहले १७ साल बचपनकी अज्ञानावस्था और पराधीनतामें बीत जाते हैं। दूसरे १७ साल बुढ़ावस्था में चले जाते हैं और शेष २६ साल नाना प्रकारके रोग, शोक, वियोग, हानि-लाभकी चिन्ता और दूसरोंसे लड़ने-भगड़ने प्रभृतिमें बीत जाते हैं।

प्राणीको कभी सुख नहीं।

पचास सालमेंसे पहले १७ बरस बचपनमें बीतते हैं। इस अवस्थामें, पैदा होते ही, बच्चा पराधीन होता है। आप उठ-बैठ चल-फिर नहीं सकता। कोई उठा लेता है, तो उठा आता है; नहीं तो मल-मुत्रमें ही पड़ा रहता है। कोई खिला-पिला देता है, तो खा-पी लेता है; नहीं तो पड़ा-पड़ा रोया करता है। कौसी बुझे अवस्था है! इसमें जरा भी सुख दिखाई नहीं देता। इसके बाद ज्यों ही वह १६ सालका

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