वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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प्रोति आदृश प्रोति है । ऐसी प्रोतिसे ही सच्ची सिद्धि मिलती है—ऐसी प्रोतिवालोंको ही परमात्माके दर्शन होते हैं ।
दोहा ।
सहो गर्भदुख जन्मदुख, जीवन त्रिया वियोग ।
बुद्ध भये सबहिन तज्यो, जगत किधौं यह रोग ॥
106. In their earliest stage of existence creatures remain in their mothers' wombs in the midst of impurities suffering great hardships with motionless bodies. In youth comes the unbearable pain of separation from consorts. Then comes the miserable old age marked unmistakably by the insolence of women. Thus O men, let us know if there is any the least happiness in this world !
ब्रायुर्वर्षशतं नृणां परिमितं राज्ञो तदर्थं गतं
तस्यार्द्धस्य परस्य चार्द्धमपरं बालत्वबुद्धत्वयोः ॥
शेषं व्याधिर्वियोगदुःखसहितं सेवादिभिर्नियते
जीवे वारितरंगचञ्चलतरे सौख्यं कुतः प्राणिनाम् ॥१०७॥
मनुष्यकी उम्र औसत सौ बरसकी मानी गई है । उसमें से आधी तो रातमें सोनेमें गुजर जाती है ; बाकीमें से एक भाग बचपनमें और एक भाग बुढ़ापेमें चला जाता है । शेषमें जो एक भाग बचता है,—वह रोग, वियोग, पराई चाकरी, शोक और हानि प्रभृति नाना प्रकारके क्लेशोंमें बीत जाता है । जल-तरङ्गवत् चञ्चल जीवनमें प्राणियोंके लिये सुख कहाँ है ? ॥१०७॥