वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ३६२ )
देहल लों तेरी नारि चलेगी, बड़ी पौल लों माई रे । भरघट लों सब बीर भतीजे, हंस अकेला जाई रे ॥३॥ द्रव्य पड़े और महल खड़े रहें, पूत रहें घर माहीं रे । जिनके काज पचै दिन राती, सो सँग चालत नाहीं रे ॥४॥ देव पितर तेरे काम न आवैं, जिनकी सेवा लोवै । चरणदास-सुखदेव-कहत हैं, हरि बिन मुक्ति न पावै ॥५॥
परमात्माकी भक्ति करो तो ऐसी करो कि, परमात्माके सिवा अन्य किसी भी देवी-देवता या संसारी पदार्थको कुछ समझो ही नहीं ; यानी उस जगदीशके सिवा सबको भूटे, निकम्मे और नाशमान समझो । केवल उसके प्रेममें रूकूँ हो जाओ और उससे प्रेमके बदलेमें कुछ माँगो नहीं ; तब देखो, क्या आनन्द आता है ! कबीर साहब कहते हैं :—
सुमिरनसे मन लाइये, जैसे दीप पतंग । प्रान तजै दिन एकमें, जरत न मोरे अंग ॥
इसी बातको उस्ताद जौड़ने किस तरह कहा है :—
कहा पतंगने यह, दारे शमा पर चढ़ कर । अजब मजा है, जो भर ले किसीके सर चढ़ कर ॥
ऐसी प्रीतिको ही प्रीति कहते हैं । दीपक और पतङ्ग, मछली और जल, नाद और कुण्डल, चातक और मेघ,—इनकी