भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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हुआ, कि उस पर पढ़ने-लिखनेका भार आ पड़ता है। रात-दिन पढ़ने-लिखनेको चिन्तामें बेचारा पागलसा बना रहता है।

इसके बाद जवानी आती है। जवानीमें स्त्री आ जाती है। अगर धन नहीं कमाता, तो माता-पिता कहते हैं :— “हमने तुम्हारी शादी कर दी, बना जितना पढ़ा-लिखा दिया, अब कमाओ; यदि नहीं कमाते, तो अपनी लुगाईको लेकर अलग हो जाओ। हमसे तुम्हारा दोनो का खर्च उठाया नहीं जाता।” अगर कोई धन्य लग गया, तो ख़ैर; नहीं तो जब तक नौकरी-चाकरी या रोज़गार नहीं लगता, रात-दिन बेचारा भाड़में चनो को तरह भूना जाता है। अगर धन्य भी लग जाता है, तो स्वामीके राज़ी या नाराज़ होनेको चिन्ता लगी रहती है अथवा कारोबारके नफ़े-नुकसानकी फिक शरीर को भीतर-ही-भीतर जलाये देती है। इसी बीचमें रोग भी होते हैं। दूसरो से मुक़द्दमेबाज़ी होती है। इस तरह इस अवस्थामें भी चैन नहीं मिलता।

अब रहा बुढ़ापा। यह तो दुःखों का भाण्डार ही है। इसमें अनेक रोग शत्रुओं की तरह चढ़ाई करते हैं, शरीर काम नहीं देता और घरके लोग अनादर करते हैं। इस अवस्थामें और भी मिट्टी ख़राब होती है। इस तरह स्पष्ट है, कि प्राणीको इस बञ्चल जीवनमें क्षण-भर भी सुख नहीं मिलता।

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