भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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दुःखपूर्ण जीवनसे प्राणी सन्तुष्ट !

यद्यपि इस जीवनमें जरा भी सुख नहीं है, क्षण-भर भी शान्ति नहीं है ; तो भी मनुष्यका ऐसा मोह है कि, वह मरना नहीं चाहता ; मौतका नाम सुननेसे काँप उठता है । अगर इस जीवनमें सुख होता, तो न जाने क्या होता ? और कुछ और दुःखों में भी यदि मनुष्य मरता है तो कहता है—“हम कुछ न जिंये, अगर और कुछ दिन जीते तो.....”

किसी कविने कहा है—

हो उग्र खिज भी, तो कहेंगे वक्के मर्ग ।

हम क्या रहे यहाँ, अभी आये अभी चले ॥

चाहे हजारों बरसको उग्र हो जाय, मरते समय यही कहेंगे, इस संसारमें कुछ भी न रहे, अभी आये अभी जाते हैं । जीनेकी अभिलाषा बनी ही रहती है ।

घृणित जीवनसे भी क्यों घृणा नहीं होती ?

मनुष्य-जीवनमें दुःख-ही-दुःख हैं ; फिर भी मनुष्य इस घृणित जीवनसे सन्तुष्ट क्यों रहता है ? इससे उसे घृणा क्यों नहीं होती ? जिस तरह मैलेसे भट्टीको घृणा नहीं होती ; उसी तरह जिनके स्वशवमें मनुष्य-जीवनके दुःख समा गये हैं,