वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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उन्हें इस मलिन और घृणित जीवन—दुःखपूर्ण जीवनसे घृणा नहीं होती। मैलेका कोड़ा मैलेमें ही सुखी रहता है; मैलेसे निकलनेमें उसे दुःख होता है। यही हाल उनका भी है, जिनके अन्तःकरण मलिन हैं। वे मलिन गृहस्थाश्रममें ही सुखी हैं।
मनुष्यका कर्तव्य क्या है ?
मनुष्य-जन्म बड़ा दुर्लभ है। यह ८४ लाख योनियाँ भोगने के बाद मिलता है। अगर मनुष्य इस मानव-जीवनमें भी चूक जाता है, आवागमन—जन्म-मरण—के फन्देसे छूटनेका उपाय नहीं करता, तो पछताता और रोता है; पर यह सुअवसर उसे फिर जल्दी नहीं मिलता। इस पर एक दृष्टान्त है :—
अवसर चूके पछताना होता है।
किसी राजाके ३६० रानियाँ थीं। राजा विदेश गया था। जिस दिन वह लौटकर आया उस दिन ३६० वे नम्बरकी रानी के यहाँ उसके जानेकी बारी थी। रानीने दासियों से कह दिया कि, मैं खोती हूँ; जब राजाजी आवें, मुझे जगा देना। रातको राजा आया; किन्तु दासियों ने भयके मारे रानीको न जगाया। सवेरे राजा चला गया। रानीने उठकर पूछा—“क्या राजाजी आये थे?” दासियों ने कहा—“हाँ, आये थे।