भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

पृष्ठ 512, कुल 648 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 512

( ३६८ )

हम लोग उनके भयके मारे आपको जगा न सकीं।” रानी बहुत रोई पड़ताई। उसे ३६० दिन तक फिर राह देखनी पड़ी। बस; यही हाल उनका है, जो इस मनुष्य-जन्मको वृथा गँवा देते हैं। इसमें भगवद्भक्ति या उपासना नहीं करते। मर जाने पर, ८३ लाख योनियों को भोगकर, फिर कहीं ऐसा अवसर हाथ आता है। अतः मनुष्यको, सब जज्जाल छोड़कर, एक मात्र भगवद्भक्तिमें लगना चाहिये; एक क्षण भी व्यय न गँवाना चाहिये। दम निकले तो जगदीश्वर की याद करता हुआ ही निकले। इसीमें कल्याण है। साँसका भरोसा क्या? आया आया, न आया न आया। “गुरु-कौमुदी”में कहा है:—

अरे भज हरेनाम दोमधाम क्षण क्षण ।

बहिस्सरति निःश्वासे विश्वासः कः प्रवर्तते ॥

अरे जीव ! प्रत्येक क्षण हरि का नाम भज। हरि का नाम कल्याण-धाम है। जो साँस बाहर निकल जाता है, उसका क्या भरोसा? आवे, न आवे।

महाभारतमें आयुकी क्षणभंगुरता पर एक इतिहास लिखा है:—

एक ब्राह्मण राह भूल कर किसी भयानक वनमें जा निकला। वहाँ हाथी और सर्प प्रभृति भयानक हिसक पशु घूम रहे थे। एक पिशाचिनी हाथमें फाँसी लिये सामने आ