भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

पृष्ठ 513, कुल 648 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 513

( ३६६ )

रही थी। उन्हें देखकर वह डरके मारे रक्षाका स्थान खोजने लगा। उसने एक अन्धा कूआ देखा, जिसमें घास छा रही थी तथा अनेक प्रकारकी बेले लग रही थीं। वह एक बेलको पकड़ कर, औंघा सिर किये, कूप में लटक गया। थोड़ी देर बाद उसने नीचेकी ओर देखा, तो एक बड़ा भारी सर्प मुँह फाड़े हुए नज़र आया; ऊपरकी ओर देखा, तो एक मस्त हाथी खड़ा दीखा। उस हाथीके छः मुख थे। उसका आधा शरीर सफेद और आधा काला था। जिस बेलको वह ब्राह्मण पकड़े हुए था, उसको वह हाथी खा रहा था और सफेद तथा काले दो चूहे उस बेलकी जड़को काट रहे थे।

इसका मतलब यों है :—वह ब्राह्मण जीव है। सघन वन यह संसार है। काम क्रोध आदि भयानक जीव इस जीवके नष्ट करनेको घूम रहे हैं। स्त्री-रूपी पिशाचिनी, भोग-रूपी पाश लेकर, इस जीवके फँसानेके लिये फिरती है। कूप में जो बेल लटक रही है, वही आयु है। उसीको पकड़कर यह जीव लटक रहा है। कूप में जो कालसर्प है, वह इस जीव का काल है, वह अपनी घात देख रहा है; ऊपर रात-दिन रूपी चूहे इस आयु रूपी बेलकी जड़ काट रहे हैं। वह हाथी वर्ष है। उसके छः मुख छः मृत्यु हैं। शुक्र और कृष्ण दो पक्ष उस हाथीके वर्ण या रंग हैं। मनुष्य इस तरह मौतके मुँहमें है। हर क्षण मौत उसे निगलती जा रही है; पर आश्चर्य्य है कि, इस आफतमें भी—मृत्यु-मुखमें, पड़ा हुआ भी—वह