भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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अपनेको सुखी सम्भक्ता है और इस नितान्त भयपूर्ण जीवनसे सन्तुष्ट है !

बीत गई सो बीत गई, आगेकी सुवि लो !

बहुतसे लोग कहा करते हैं, कि हमने सारी उम्र परपीड़न या पापकर्मोंमें खोई; भगवान्‌को कभी भूलसे भी याद न किया ; अब हम क्या कर सकते हैं ? यह कहना भारी भूल है । जो समय बीत गया, वह तो लौट कर आवेगा नहीं ; पर जो समय हाथमें है, उसे तो सुकर्म और ईश्वरकी यादमें लगाना चाहिये । यदि बाकी उम्र भी व्यर्थके भ्रमकटोंमें गँवाई जायगी, तो अन्तकालमें भारी पछतावा होगा । किसी कविने ठीक ही कहा है—

पुत्र कलत्र सुमित्र चरिल, धरा धन धाम है बन्धन जीको । बारहिँ बार विषैफल खात, अघात न जात सुधारस फीको । आन श्रोसान तजो अभिमान, कही सुन, नाम भजो सिय-पीको । पाय परमपद हाथ सों जात, गई सो गई, अब राख रही को ।