भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ४०१ )

एक नटकी उपदेशपद कहानी ।

एक राजा बड़ा ही कञ्जूस था। उसने प्रचुर धन सञ्चय किया था; पर उससे न तो वह अपने पुत्रको सुख भोगने देता था और न स्वर्गके डरसे अपनी कन्याकी शादी ही करता था। एक दिन एक नट-नटी उसके दरबारमें आये और राजासे तमाशा देखनेकी प्रार्थना की। राजाने कहा—“अच्छा, अमुक दिन देखा जायगा।” नटनी बार-बार याद दिलाती रही और राजा बारबार-टालता रहा। अन्तमें नटनी ने वजीरसे कहा—“अगर राजा साहब तमाशा न देखें, तो हम चले जायें; हमें स्वर्ग खाते बहुत दिन हो गये।” यह सुन वजीरने राजासे कहा—“महाराज! आप तमाशा देख लीजिये। हम लोग चन्दा करके नटको कुछ दे देंगे। अगर आप तमाशा न देखेंगे, तो बड़ी बदनामी होगी।” राजा इस बात पर राजी हो गया। तमाशा हुआ। तमाशा करते-करते जब दो घड़ी रात रह गई और राजाने कुछ भी इनाम न दिया, तब नटनीने नटसे कहा :—

रात घड़ी भर रह गई, थाके पिप्पर आय ।

कह नटनी सुन मालदेह, सधुरा ताल बजाय ॥

नटनीकी बात सुनकर नटने कहा :—

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